भिलाई, छत्तीसगढ़ सहित संपूर्ण भारत में भोजली बोकर जीवन में खुशहाली लाने की विशिष्ट परंपरा है। यह मूलतः कृषि के बीजांकुरण का लोक अनुष्ठानिक पर्व है। इसे अलग-अलग जाति-समुदायों के लोगों द्वारा अलग-अलग अवसरों पर बोने का प्रचलन है। पर उसके पीछे की मूल मान्यताएं, उद्देश्य आने वाली फसलों की अच्छी पैदावारी और जीवन में खुशहाली का है।
तीजा के अवसर पर भारत भर के अलग-अलग जाति- समुदायों सहित छत्तीसगढ़ में बहुलता के साथ रहने वाले मराठी समुदाय की सभी सुहागीनों, नवविवाहिताओं व किशोरियों द्वारा हरितालिका के दिन दिन-रात तीजा का उपवास रहकर रात भर फुलों का ‘फुलेरा’ की सजावट कर शिव- पार्वती की आराधना करती हैं। रात भर जागरण कर सेवा के गीत गाती हैं। वहीं ‘तीज भोजली’ को माता का स्वरुप मानकर दोहरे पर्री पर बोयी गई भोजली के बीच में नदी से उसी दिन पसर भर रेत से शिवलिंग व हल्दी जो कि सुहाग व विवाह का प्रमुख हिस्सा है। उससे माता पार्वती की प्रतिमा बनाकर पूजा करते हैं।
लोक संस्कृति कर्मी एवं जनजाति शोधार्थी राम कुमार वर्मा ने मराठी समुदाय की तिजहारीनों पुष्पा निर्मलकर, पूनम विश्वकर्मा, विजयलक्ष्मी विश्वकर्मा, सोनाली ठाकुर, उर्मिला साहू, रुचि ध्रुव, पुष्पा भोंसले, सुनीता रगड़े, रेशमा, ममता साहू, प्रीति पाल, गायत्री पाल, कविता सोमेवार, शारदा भारती, नारायणी साहू, संगीता नवघरे, सरस्वती बहरकर, मनीषा, मंजू आदि से संवाद कर बताया कि तीजा के दूसरे दिन सुबह तीज भोजली एवं शिव-पार्वती के आसन को अच्छी तरह से सजाने की दृष्टि से बनाए गए फुलेरा को स्थानीय नदी, तालाब में महिलाएं परिवार के साथ विसर्जन करने जाती हैं।
वहां भोजली माता व शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना कर जलदेवती में सात बार स्नान कराने के बाद जल देवी से घर- परिवार की सुख-समृद्धि, खुशहाली, वंश वृद्धि, पति के दीर्घायु होने की कामनाओं के साथ श्रद्धा भाव से विसर्जन करती हैं। जिस घर की भोजली जितनी अच्छी लहलहाती है, उस घर में उतनी ही अधिक खुशहाली आने, सुख-समृद्धि बढ़ने की मूल भावना समाहित होती है। छत्तीसगढ़ में अब इसका चलन बढ़ते रुप में देखने को मिल रहा है। महिलाओं द्वारा बहुत ही उत्साह के साथ फूलों से ‘फुलेरा’ और रबी फसल के साथ तरह के बीजों गेहूं, जौ, चना, मसूर, मूंग, सरसों, उड़द, लाख, लाखड़ी आदि को सांस की दोहरी पर्री पर बोकर ‘भोजली माता’ की सेवा करके नदी में विसर्जन करने के बाद कुछ पत्तियों को एक-दूसरे कान पर खोंस कर अपने से बड़ों से आशीर्वाद प्राप्त करने, देवी-देवताओं में चढ़ा कर, अपने घर की पूजा कक्ष में रख कर अपने घर की सुख-समृद्धि, वंश वृद्धि, जीवन की खुशहाली, पति के सुदीर्घ और स्वस्थ जीवन की कामनाएं करती हैं।
यह लोक आनुष्ठानिक पर्व अब वर्तमान और नई पीढ़ियां में परंपरा से हस्तांतरित होती जा रही है। यह देख कर बेहद सुखद अनुभूति हुई है।
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