भिलाई, अहिवारा विधायक डोमनलाल कोर्सेवाड़ा का शुक्रवार दोपहर हैदराबाद में निधन हो गया। बे करीब 22 दिनों से हैदराबाद के अस्पताल में उपचार करा रहे थे। एक शिक्षक के रूप में जीवन की शुरुआत करने वाले कोर्सेवाड़ा ने जनप्रतिनिधि के रूप में भी अपनी अलग पहचान बनाई। लोग उन्हें राजनीतिक पद से अधिक ‘गुरुजी’ के नाम से जानते थे। सादगी, सहज व्यवहार और क्षेत्र के लोगों से आत्मीय जुड़ाव उनके व्यक्तित्व की विशेषता रही।
डोमनलाल कोर्सेवाड़ा ने जनवरी 1972 में सहायक शिक्षक के रूप में शासकीय सेवा प्रारंभ की थी। करीब 34 वर्षों तक शिक्षा विभाग में रहते हुए उन्होंने विद्यार्थियों को शिक्षित करने के साथ उनके व्यक्तित्व निर्माण में भी योगदान दिया। पदोन्नति के बाद वे व्याख्याता बने। शिक्षा को समाज में बदलाव का आधार मानने वाले कोर्सेवाड़ा ने सक्रिय राजनीति में आने के लिए सेवानिवृत्ति से करीब 22 महीने पहले ही शासकीय सेवा छोड़ दी। शिक्षक के रूप में मिली पहचान जीवनभर उनके साथ रही और क्षेत्र के लोग उन्हें आदरपूर्वक गुरुजी कहते रहे।
ताराचंद साहू से मिला राजनीतिक मार्गदर्शन
राजनीतिक जीवन में प्रवेश से पहले कोर्सेवाड़ा ने करीब 12 वर्षों तक पूर्व सांसद स्वर्गीय ताराचंद साहू के निज सहायक के रूप में जिम्मेदारी निभाई। इस दौरान उन्हें संगठनात्मक गतिविधियों और जनसमस्याओं को समझने का अवसर मिला। दुर्ग संसदीय क्षेत्र की विभिन्न विधानसभाओं में कार्यकर्ताओं और आम लोगों से उनका संपर्क बना। ताराचंद साहू के मार्गदर्शन में उन्होंने राजनीति को जनसेवा के माध्यम के रूप में समझा और बाद में भाजपा में सक्रिय भूमिका निभाने लगे।
दो बार विधायक बने
वर्ष 2008 में परिसीमन के बाद अहिवारा विधानसभा क्षेत्र अस्तित्व में आया। इसी वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कोर्सेवाड़ा को प्रत्याशी बनाया और वे क्षेत्र के पहले विधायक निर्वाचित हुए। वर्ष 2013 में पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया और सांवलाराम डाहरे को उम्मीदवार बनाया। कोर्सेवाड़ा ने संगठन के निर्णय को स्वीकार करते हुए पार्टी प्रत्याशी का सहयोग किया। वर्ष 2018 में भी वे चुनाव मैदान में नहीं उतरे, लेकिन क्षेत्र के लोगों और कार्यकर्ताओं से उनका संपर्क बना रहा। वर्ष 2023 में भाजपा ने उन्हें फिर प्रत्याशी बनाया और उन्होंने जीत हासिल की।
पुरस्कारों से भी हुए सम्मानित
कोर्सेवाड़ा को वर्ष 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने गुरु घासीदास सम्मान से सम्मानित किया था। वर्ष 2013 में उन्हें श्रेष्ठ विधायक का पुरस्कार भी मिला। इन सम्मानों के बावजूद उनकी पहचान सादगी और सहजता से जुड़ी रही। वे सार्वजनिक जीवन में अपने मार्गदर्शकों, कार्यकर्ताओं और क्षेत्र की जनता के योगदान को हमेशा महत्वपूर्ण बताते थे। उनके निधन से अहिवारा ने एक ऐसे जनप्रतिनिधि को खो दिया, जिसने शिक्षक के रूप में पीढ़ियों को दिशा दी और राजनीति में रहते हुए क्षेत्र के विकास के लिए काम किया। उनके जीवन का सबसे आत्मीय परिचय यही रहा कि विधायक होने के बाद भी वे लोगों के लिए गुरुजी ही बने रहे। उनकी स्मृतियां और जनसेवा से जुड़ा योगदान क्षेत्रवासियों के बीच लंबे समय तक बना रहेगा।
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