विश्व आदिवासी दिवस पर भिलाई में दिखी जनजातीय संस्कृति की झलक, पारंपरिक वेशभूषा में निकली रैली

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सेक्टर-1 मुर्गा चौक से रिसाली आदिवासी भवन तक निकाली गई रैली, जंगल और पर्यावरण संरक्षण का दिया संदेश

भिलाई, विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर रविवार को छत्तीसगढ़ सहित भिलाई में आदिवासी समाज ने हर्षोल्लास के साथ कार्यक्रम आयोजित किए। इस्पात नगरी भिलाई में निवासरत आदिवासी समाज के बड़ी संख्या में लोग पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुए। हाथों में पारंपरिक हथियार और वाद्ययंत्र लेकर समाज के लोगों ने आदिवासी नृत्य और गीतों के साथ रैली निकाली। इससे शहर में आदिवासी संस्कृति और परंपराओं की मनमोहक झलक देखने को मिली।

सुबह से ही समाज के लोग सेक्टर-1 स्थित मुर्गा चौक में एकत्रित होने लगे थे। यहां से पारंपरिक वेशभूषा धारण किए महिला, पुरुष और युवाओं ने रैली शुरू की। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर आदिवासी समाज के लोग नृत्य करते हुए आगे बढ़े। रैली विभिन्न मार्गों से होते हुए रिसाली स्थित आदिवासी भवन पहुंची, जहां कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

पारंपरिक वेशभूषा और नृत्य रहा आकर्षण का केंद्र

रैली में शामिल समाज के लोगों ने अपनी पारंपरिक वेशभूषा धारण की थी। पुरुषों और महिलाओं ने पारंपरिक आभूषणों के साथ आदिवासी संस्कृति को प्रदर्शित किया। हाथों में पारंपरिक हथियार और अन्य सांस्कृतिक प्रतीक लेकर लोग रैली में शामिल हुए। रास्ते भर आदिवासी नृत्य और गीतों ने माहौल को उत्सवमय बनाए रखा।

जंगल बचाने का दिया संदेश

कार्यक्रम के दौरान आदिवासी समाज के अध्यक्ष और पदाधिकारियों ने जंगलों के लगातार हो रहे कटाव पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज का जीवन सदियों से जंगल और प्रकृति से जुड़ा हुआ है। जंगल उनके लिए केवल रहने और आजीविका का साधन नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति, परंपरा और जीवन का अभिन्न हिस्सा है।

उन्होंने कहा कि लगातार जंगलों की कटाई से आदिवासी समाज काफी दुखी है। विकास के नाम पर जंगलों को उजाड़ने की प्रक्रिया को स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने स्पष्ट कहा कि आदिवासियों के घर और उनकी प्राकृतिक विरासत को उजाड़ने का काम बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

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जंगल सिर्फ आदिवासियों के नहीं, पूरी मानवता के लिए जरूरी

समाज के पदाधिकारियों ने कहा कि जंगल केवल आदिवासी समाज के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी मानव जाति, पशु-पक्षियों और सभी जीव-जंतुओं के लिए आवश्यक हैं। जंगल समाप्त होंगे तो इसका असर पर्यावरण के साथ मानव जीवन पर भी पड़ेगा। जंगल बचेंगे तभी प्रकृति का संतुलन कायम रहेगा।

उन्होंने विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर पूरे समाज से जंगलों और पर्यावरण की रक्षा के लिए एकजुट होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की लड़ाई केवल अपने अधिकारों और जंगलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों और पूरे मानव समाज के भविष्य से जुड़ी हुई है।

संस्कृति के संरक्षण के साथ अधिकारों की आवाज

कार्यक्रम में आदिवासी समाज के लोगों ने अपनी संस्कृति, परंपरा और पहचान को संरक्षित रखने का संकल्प लिया। वक्ताओं ने कहा कि आधुनिक विकास के दौर में भी आदिवासी समाज अपनी परंपराओं और प्राकृतिक जीवनशैली को बचाए रखना चाहता है। विश्व आदिवासी दिवस ऐसे अवसर के रूप में सामने आता है, जब समाज अपनी एकजुटता प्रदर्शित करने के साथ-साथ प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देता है।

Link : https://shricgnewscreator.com/a-glimpse-of-tribal-culture-was-seen-in-bhilai-on-world-tribal-day-a-rally-was-held-featuring-participants-in-traditional-attire/

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