छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘भेद’ सिनेमाघरों में प्रदर्शित, अर्जुंदा की माटी और लोकसंस्कृति की दिखेगी खास झलक

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पुनर्जन्म की अवधारणा पर आधारित सस्पेंस थ्रिलर में रहस्य और रोमांच का संगम, लोकरंग अर्जुंदा के प्रसिद्ध गीत ‘लाली बंगला’ से जुड़ा दृश्य बना आकर्षण

भिलाई, छत्तीसगढ़ी सिनेमा के दर्शकों के लिए सस्पेंस, रोमांच और सामाजिक संदेश से भरपूर फिल्म ‘भेद’ 2 अक्टूबर से छत्तीसगढ़ के विभिन्न सिनेमाघरों में प्रदर्शित हो रही है। पुनर्जन्म की अवधारणा पर आधारित यह सस्पेंस थ्रिलर फिल्म रहस्य की परतों के बीच आगे बढ़ती है और दर्शकों की जिज्ञासा बनाए रखने का प्रयास करती है। फिल्म को दर्शकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलने की जानकारी निर्माण टीम ने दी है। फिल्म की कहानी, प्रस्तुति और छत्तीसगढ़ी परिवेश को लेकर टीम उत्साहित है।

फिल्म के प्रचार-प्रसार के सिलसिले में गुरुवार को भिलाई के चंद्रा टॉकीज में फिल्म की निर्माण टीम और कलाकारों ने मीडिया से चर्चा की। इस दौरान फिल्म के निर्माण, कहानी, कलाकारों और इसकी खास विशेषताओं के बारे में जानकारी साझा की गई। टीम ने बताया कि फिल्म की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक इसकी स्थानीय संस्कृति से जुड़ाव है। फिल्म की लगभग 90 प्रतिशत शूटिंग लोकरंग अर्जुंदा के परिसर और आसपास के परिवेश में की गई है। इससे फिल्म में छत्तीसगढ़ की माटी, स्थानीय वातावरण और लोकसंस्कृति की झलक देखने को मिलती है।

अर्जुंदा के विवेक कमलेकर ने किया निर्देशन

फिल्म ‘भेद’ का निर्देशन अर्जुंदा टिकरी निवासी विवेक कमलेकर ने किया है। वे इससे पहले नृत्य निर्देशक और सह-निर्देशक के रूप में काम कर चुके हैं। फिल्म के निर्माता सत्येंद्र यादव हैं। इसका निर्माण सुदर्शन स्टूडियो के बैनर तले किया गया है, जबकि कार्यकारी संस्था इंद्रावती एंटरटेनमेंट का भी सहयोग रहा है।

फिल्म में मन कुरैशी, राया डोंगरिया, रेशमा जैन, हर्षवर्धन, साहिल दास, उपासना वैष्णव और पुष्पेंद्र सिंह सहित अन्य कलाकार प्रमुख भूमिकाओं में नजर आ रहे हैं। कलाकारों के अभिनय और कहानी की प्रस्तुति के माध्यम से दर्शकों तक सस्पेंस और सामाजिक संदेश पहुंचाने का प्रयास किया गया है।

लोकरंग अर्जुंदा का मिला विशेष सहयोग

फिल्म के निर्माण में लोकरंग अर्जुंदा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लोकरंग अर्जुंदा के संस्थापक एवं निर्देशक स्वर्गीय दीपक चंद्राकर के सुपुत्र आनंद चंद्राकर ने फिल्म की शूटिंग के लिए लोकरंग परिसर उपलब्ध कराया और निर्माण टीम को सहयोग दिया। इससे फिल्म को छत्तीसगढ़ की लोकपरंपरा और सांस्कृतिक परिवेश से जोड़ने में मदद मिली।

फिल्म में लोकरंग अर्जुंदा के प्रसिद्ध गीत ‘लाली बंगला’ से जुड़ा दृश्य भी विशेष आकर्षण के रूप में शामिल किया गया है। यह दृश्य छत्तीसगढ़ की लोककला, संगीत और सांस्कृतिक विरासत की झलक प्रस्तुत करता है। स्थानीय परिवेश और लोकसंस्कृति को कहानी के साथ जोड़ने का प्रयास फिल्म को छत्तीसगढ़ी सिनेमा की पहचान से जोड़ता है।

भिलाई-चरोदा के अमीर एस. रजा ने दिया संगीत

फिल्म के संगीत निर्देशक अमीर एस. रजा हैं, जो भिलाई-चरोदा के निवासी हैं। फिल्म के गीतों को स्वपन भट्टाचार्य, अंकुश भारद्वाज, आदित्य जैन, मिथिलेश्वरी सेन और कचन जोशी ने अपनी आवाज दी है। फिल्म के कुछ गीत गुरुदेव ने आशीर्वाद और स्नेह स्वरूप लिखे हैं, जबकि कुछ गीतों का लेखन भिलाई के निशांत कुमार ने किया है।

संगीत और गीतों के माध्यम से फिल्म में छत्तीसगढ़ी परिवेश के अनुरूप भावनात्मक जुड़ाव बनाने की कोशिश की गई है। स्थानीय कलाकारों और संगीत से जुड़े लोगों की भागीदारी भी फिल्म की विशेषताओं में शामिल है।

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अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों पर भी प्रहार

‘भेद’ की कहानी पुनर्जन्म की अवधारणा पर आधारित है। सस्पेंस और रहस्य के साथ आगे बढ़ती कहानी में दर्शकों की उत्सुकता बनाए रखने का प्रयास किया गया है। इसके साथ ही फिल्म समाज में अंधविश्वास के नाम पर फैली कुरीतियों और अराजक गतिविधियों की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है। मनोरंजन के साथ सामाजिक विषयों को प्रस्तुत करना फिल्म की प्रमुख विशेषताओं में शामिल है।

निर्माण टीम के अनुसार, फिल्म में अभद्र संवादों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसी वजह से इसे पारिवारिक दर्शकों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। टीम का कहना है कि फिल्म के माध्यम से मनोरंजन के साथ छत्तीसगढ़ की संस्कृति और सामाजिक सरोकारों को भी सामने लाने का प्रयास किया गया है।

छत्तीसगढ़ी सिनेमा को प्रोत्साहित करने की अपील

फिल्म को मिल रही सकारात्मक प्रतिक्रियाओं से कलाकारों और निर्माण टीम में उत्साह है। टीम ने छत्तीसगढ़ के दर्शकों से सिनेमाघरों में पहुंचकर ‘भेद’ देखने की अपील की है। साथ ही स्थानीय कलाकारों, छत्तीसगढ़ी फिल्मों और प्रदेश की लोकसंस्कृति को प्रोत्साहित करने का आग्रह किया है।

फिल्म की लगभग 90 प्रतिशत शूटिंग स्थानीय परिवेश में होने और लोकरंग अर्जुंदा की सांस्कृतिक विरासत को स्थान मिलने से यह फिल्म छत्तीसगढ़ी सिनेमा में क्षेत्रीय पहचान को सामने लाने का प्रयास करती है। अब फिल्म की कहानी, कलाकारों का अभिनय और लोकसंस्कृति से जुड़ाव दर्शकों को कितना आकर्षित करता है, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।

Link : https://shricgnewscreator.com/the-chhattisgarhi-film-bhed-has-been-released-in-cinemas-it-offers-a-special-glimpse-into-the-soil-and-folk-culture-of-arjunda/

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