बैगा जनजाति की लोक संस्कृति पर 20 वर्षों के शोध को वरिष्ठ समाज प्रमुखों ने सराहा

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लोक कला, लोक साहित्य, पर्व, अनुष्ठान और जीवनशैली पर तैयार की गई शोधपरक पांडुलिपि का किया अवलोकन

दुर्ग, विलुप्त होती लोक कलाओं एवं लोक साहित्यिक विधाओं के संकलन, संग्रहण और संरक्षण में शिक्षकों एवं शोधार्थियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसी दिशा में सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र, नई दिल्ली के जिला स्रोत एवं राज्य स्तरीय स्रोत व्यक्ति राम कुमार वर्मा द्वारा छत्तीसगढ़ सहित पड़ोसी राज्यों की जनजातियों की लोक सांस्कृतिक परंपराओं, लोक पर्वों, लोक अनुष्ठानों तथा लोक वाद्यों के निर्माण और वादन पर लगातार शोध कार्य किया जा रहा है।

राम कुमार वर्मा द्वारा विभिन्न जनजातीय समाजों की सांस्कृतिक परंपराओं पर तैयार किए गए शोधपरक आलेखों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर की शोध संगोष्ठियों में भी प्रस्तुत किया जा रहा है। इसी क्रम में छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की सीमा से लगे क्षेत्रों में निवासरत बैगा जनजाति की लोक संस्कृति, लोक साहित्य और जीवन शैली पर आधारित एक शोधपरक पुस्तक तैयार की जा रही है। इस पुस्तक के लिए पिछले करीब 20 वर्षों से निरंतर शोध, संकलन और क्षेत्रीय अध्ययन का कार्य किया गया है।

पांडुलिपि में बैगा समाज की लोक परंपराओं, लोकगीतों, लोक नृत्यों, लोक संस्कारों, लोक पर्वों, अनुष्ठानों तथा पारंपरिक वाद्य यंत्रों से संबंधित सामग्री को सचित्र एवं शोधपरक तरीके से प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक की तैयार सामग्री का वरिष्ठ बैगा समाज प्रमुखों एवं जनप्रतिनिधियों ने अवलोकन किया और इसकी सराहना की।

इस अवसर पर प्रदेश अध्यक्ष आदिम जाति बैगा समाज इतवारी राम मछिया, प्रदेश सलाहकार गौंठूराम बरंगिया बैगा, धनीराम कड़मिया, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित, शिक्षक तीजल मड़िया, पूर्व अभिकरण जिला अध्यक्ष परशुराम कुम्हिया बैगा तथा जनपद सदस्य लीलादादर तुलसी सुरखिया सहित अन्य वरिष्ठ जनों ने पांडुलिपि में शामिल 18 प्रमुख बिंदुओं में संकलित सचित्र सामग्री का अवलोकन किया।

शीघ्र प्रकाशन और समारोहपूर्वक लोकार्पण की अपील

वरिष्ठ समाज प्रमुखों ने कहा कि बैगा समाज की अनेक पारंपरिक लोक कलाएं और सांस्कृतिक विधाएं धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही हैं। ऐसे में इनके दस्तावेजीकरण और संरक्षण के प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगे। उन्होंने शोध कार्य को शीघ्र पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने तथा समारोहपूर्वक लोकार्पण कराने की बात कही।

उन्होंने बैगा समाज के वरिष्ठजनों के सानिध्य में लोक कलाओं, लोक नृत्य परंपराओं, लोकगीतों, लोक संस्कारों और लोक अनुष्ठानिक पर्वों को व्यवस्थित रूप से प्रलेखित करने में सहयोग देने की अपील की। साथ ही शोधार्थी से क्षेत्र में पहुंचकर विभिन्न लोक पर्वों का प्रत्यक्ष अवलोकन करने और समाज के लोगों से संवाद कर अधिक से अधिक प्रामाणिक जानकारी संकलित करने का आग्रह किया।

समाजजनों का रहा महत्वपूर्ण सहयोग

इस शोधपरक पांडुलिपि को तैयार करने में बैगा समाज प्रमुख लमतु राम बगदरिया भुरसीपकरी, अर्जुन सिंह धुर्वे धुरकटा, गोपाल राम धुर्वे चांडा, मोती राम जामपानी, भागमती समनापुर सहित अनेक समाजजनों का सहयोग रहा है। उनके सहयोग से बैगा जनजाति की पारंपरिक संस्कृति और जीवनशैली से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियों को संकलित किया गया है।

शोधार्थी राम कुमार वर्मा ने बताया कि उनका उद्देश्य बैगा समाज की समृद्ध लोक सांस्कृतिक विरासत को प्रमाणिक रूप से संकलित कर सुरक्षित करना है, ताकि वर्तमान और आने वाली पीढ़ियां अपनी पारंपरिक कला, संस्कृति और लोक जीवन से परिचित हो सकें।

Link : https://shricgnewscreator.com/senior-community-leaders-have-appreciated-the-20-years-of-research-on-the-folk-culture-of-the-baiga-tribe/

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