दुर्ग, छत्तीसगढ़ी भाषा आंदोलन के प्रमुख पुरोधा नंदकिशोर शुक्ल इन दिनों दुर्ग जिले के प्रवास पर हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीय अस्मिता के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले शुक्ल ने वर्षों तक प्रदेश के गांव-गांव में पैदल और साइकिल यात्राएं कर भाषा जागरण का अलख जगाया है। उनके सतत प्रयासों से छत्तीसगढ़ी भाषा आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिला और मातृभाषा के प्रति लोगों में गौरव की भावना मजबूत हुई।
शुक्रवार को नंदकिशोर शुक्ल ने कलेक्ट्रेट परिसर स्थित छत्तीसगढ़ महतारी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर प्रदेश की भाषा और संस्कृति के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की। इसके पश्चात उन्होंने दुर्ग जिला न्यायालय परिसर का भ्रमण कर अधिवक्ताओं एवं प्रबुद्ध नागरिकों से मुलाकात की। दुर्ग प्रवास के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता गणेश शुक्ला ने उनका स्वागत करते हुए न्यायालय परिसर में अधिवक्ताओं से संवाद के लिए आमंत्रित किया।

अधिवक्ताओं को संबोधित करते हुए नंदकिशोर शुक्ल ने कहा कि छत्तीसगढ़ी भाषा को राजभाषा का दर्जा मिलना प्रदेशवासियों के लिए गौरव का विषय है, लेकिन इसका वास्तविक सम्मान तभी होगा जब इसे दैनिक व्यवहार, प्रशासनिक कार्यों और सामाजिक जीवन में अधिकाधिक स्थान दिया जाए। उन्होंने कहा कि मातृभाषा किसी भी समाज की पहचान, संस्कृति और परंपरा की आधारशिला होती है।
इस अवसर पर उन्होंने अपने आंदोलन से जुड़े कई प्रेरक प्रसंग साझा किए और युवाओं से छत्तीसगढ़ी भाषा के संरक्षण व संवर्धन में सक्रिय भागीदारी निभाने का आह्वान किया। कार्यक्रम में अधिवक्तागण ऋषिकांत तिवारी, सरदार राजेंद्र सिंह भल्ला, संजीव कुमार तिवारी, संजय दीवान, रमेश तिवारी, अमित कुमार अग्नि, राकेश दुबे (सीनियर), के.के. तिवारी, छतर सिंह चंद्राकर पचपेड़ी सहित अनेक अधिवक्ता उपस्थित रहे।






