भिलाई में साहित्य और सद्भाव का संगम, 30 से अधिक कवि-शायरों ने बांधा समां
भिलाई, प्राचीन बैकुंठधाम डेम हनुमान मंदिर परिसर में ‘प्राचीन बैकुंठधाम मंदिर माता श्रृंगार समिति’ के तत्वावधान में सर्वधर्म समभाव का संदेश देते हुए भव्य काव्य गोष्ठी एवं सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का संयोजन राष्ट्रभक्त कवयित्री माला सिंह एवं शायर नवेद रजा दुर्गवी ने किया।
12 अप्रैल के आयोजन में मुख्य अतिथि समाजसेवी लेखक एवं ‘आरंभ’ के मुख्य संरक्षक कैलाश जैन बरमेचा रहे, जबकि मंजू जैन विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रगतिशील साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के अध्यक्ष एवं कवि-पत्रकार प्रदीप भट्टाचार्य ने की।

कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के पूजन-अर्चन से हुआ। सरस्वती वंदना मोहम्मद हुसैन माजाहिर रायपुरी ने प्रस्तुत की। स्वागत उद्बोधन संयोजिका माला सिंह ने दिया, जबकि मंच संचालन नवेद रजा दुर्गवी ने कुशलता से किया।
मुख्य अतिथि कैलाश जैन बरमेचा ने आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि साहित्यिक कार्यक्रम रचनाकारों के उत्साह को बढ़ाते हैं और समाज को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि रचना ही व्यक्ति की असली पहचान होती है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रदीप भट्टाचार्य ने बताया कि भिलाई-दुर्ग के साहित्यकारों द्वारा ‘आरंभ’ संस्था की स्थापना रचनाकारों को मंच देने के उद्देश्य से की गई है। उन्होंने कहा कि रचनाकारों को सम्मान के पीछे नहीं, बल्कि अपनी रचना को बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए।
इस अवसर पर ‘आरंभ’ संस्था की ओर से नवेद रजा दुर्गवी को उत्कृष्ट संचालन के लिए नगद राशि देकर सम्मानित किया गया। वहीं मंदिर समिति द्वारा कैलाश जैन बरमेचा, मंजू जैन, प्रदीप भट्टाचार्य, नवेद रजा दुर्गवी एवं माला सिंह को शॉल, श्रीफल एवं सम्मान पत्र भेंट कर सम्मानित किया गया।
काव्य गोष्ठी में दुर्ग, भिलाई, रायपुर एवं राजनांदगांव से आए 30-40 कवि एवं शायरों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। रचनाओं में सामाजिक सरोकार, संवेदनाएं, जीवन संघर्ष, राष्ट्रभक्ति और समसामयिक विषयों की झलक देखने को मिली।
कुछ प्रमुख रचनाकारों द्वारा प्रस्तुत की गई रचना की पंक्तियां-
रुको पथिक तुम कहाँ जा रहे हो/मैली शरीर दुःखी मन से/फटे पुराने शरीर लेकर/जीव के अंतिम क्षण में/खंडहर से झरता हुआ मिट्टी जैसे…
– प्रकाशचंद्र मण्डल
रहम करता नहीं जालिम ना अफसोस होता है/उस मजलूम पे लानत जो खामोश होता है…
– राकेश गुप्ता ‘रुसिया’
हमारी सांस चल रही मगर कहीं हवा नहीं/अभी हमारे ख्वाब में/ कहीं तो ‘पर’ लगा नहीं…
– सुशील यादव
हम आज जहाँ हैं/वहाँ से और ऊँचा उठे/यही हम हमारा उद्देश्य है…
– शशिप्रभा गुप्ता
खाली हाथों में ही किस्मत तो नहीं होती है/मेहनतों से ही लकीरें ये बदल जाती है/तुम अगर ख्वाब हकीकत में बदलना चाहो/रात की नींद भी आँखों से निकल जाती है…
– फरीदा शाहीन
इस अर्पण में कुछ और नहीं/केवल उत्सर्ग झलकता है/मैं दे दूँ और कुछ न लूँ/इतना ही सरल झलकता है…
– डॉ. विजय कुमार गुप्ता ‘मुन्ना’
मोबाइल है तो मुमकिन है/दुनिया को मुट्ठी में कर लो/आस मां के तारे गिन लो/जंगल घुमो बीच उतर लो/मोबाइल है तो मुमकिन है/अच्छों को चूना लग जाए/एक मोबाइल वो भी रखता/घर का भेदी लंका ढाये…
– डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’
वार मुझपे वो करेगा दिल में आया ही नहीं/आज तक जिस ने कभी खंजर चलाया ही नहीं/मैं तुम्हारी बात पे नाराज क्यों होने लगा/मैं तुम्हारी बात को दिल से लगाया ही नहीं…
– हाजी रियाज खान गौहर
रात भर जाग कर मैंने पहरा दिया/क्यूँ सुई शक की मुझ पर ही ठहरा दिया/जिसको दिल पे दिया जान भी दे चुकी/जख्म भी सबसे उसने ही गहरा दिया…
– नीलम जायसवाल
अगर कहीं न मिले ठिकाना/पता हमारा संभाल कर रखना…
– सोनिया सोनी
दो नज़र मिलते, तो मन की बात कहते/तुम अगर मिलते, तो मन की बात कहते/फोन पर अब क्या बताएं हाल अपना/चाय पर मिलते, तो मन की बात कहते…
– अनिल राय ‘भारत’
आज इंसान इंसान को बढ़ने कहाँ देते हैं/थामने को कंधा, पकड़ने कहाँ देते हैं/अरे बुझा देते हैं खार ‘यश’ जलती चिराग भी/जब पढ़ने बैठो तो लोग पढ़ने कहाँ देते हैं…
– डॉ. यशवंत ‘यश’ सूर्यवंशी
जिसने भी इनका नाम लिया बल पाया है/जो गुणगान करते, उसने अंकल पाया हूँ/सच्चे मन से भक्ति करके देख भला तू/जो पुकारे हनुमान उसने जल थल पाया है…
– नवेद रजा दुर्गवी
शौक जीने का यहाँ/लगे हैं सबको अच्छा/शौक पालके सभी/बने हैं प्यारा बच्चा…
– सुरेश कुमार बन्छोर
तेरी रोशनी से जगमगाता है शहर/हम भी चमक जाएं, तु छू लो अगर…
– गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’

प्रमुख प्रस्तुतियों में प्रकाशचंद्र मण्डल, ब्रजेश मल्लिक, घनश्याम सोनी, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, मोहम्मद हुसैन माजाहिर रायपुरी, बैकुंठ महानंद, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, डॉ. विजय कुमार गुप्ता ‘मुन्ना’, राकेश गुप्ता ‘रूसिया’, सुशील यादव, शशिप्रभा गुप्ता, आशा देवी गुप्ता, इस्माइल आजाद, हाजी रियाज खान गौहर, टीआर कोशरिया ‘अलकहरा’, नीलम जायसवाल, ओमप्रकाश जायसवाल, चंद्रकुमार बर्मन, डॉ. यशवंत सूर्यवंशी ‘यश’, सतीश शांति मोहन, मोनु रंजन भोई, सुरेश कुमार बंछोर ‘अभ्याअर्थी’, डॉ. संजय दानी, प्रदीप कुमार पाण्डेय, अनिल राय ‘भारत’, सोनिया सोनी, फरीदा शाहीन और सहित अन्य रचनाकारों ने अपनी कविताओं और शायरी से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लेखक, कवि, पत्रकार, बुद्धिजीवी एवं मंदिर समिति के सदस्य उपस्थित रहे। आयोजन ने न केवल साहित्यिक ऊर्जा का संचार किया, बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता का भी सशक्त संदेश दिया।


