A Comparative Study of Islamic Jurisprudence and the Principles of Indian Democracy

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इस्लामी फ़िक़्ह और भारतीय लोकतंत्र के मानकों के बीच तुलनात्मक अध्ययन

इस्लामी फ़िक़्ह और भारतीय लोकतंत्र दो अलग विचारधाराओं के प्रतिनिधि हैं, लेकिन गहराई से अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि इन दोनों के बीच कई मूलभूत सिद्धांतों में समानताएँ भी हैं। इस्लामी फ़िक़्ह, जो कुरआन, हदीस, इज्मा और क्रियास पर आधारित है, मानव जीवन के हर पहलू को व्यवस्थित करने की क्षमता रखती है, जबकि भारतीय लोकतंत्र एक संवैधानिक और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था है जो जनता की संप्रभुता, समानता, स्वतंत्रता और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है। यद्यपि इन दोनों प्रणालियों की नींव और स्रोत अलग-अलग हैं, लेकिन इनके उद्देश्यों में एक प्रकार की समानता देखी जा सकती है। इस लेख में इन दोनों के बीच विस्तृत तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया जा रहा है।

सबसे पहले यदि न्याय के सिद्धांत को देखें तो इस्लामी फ़िक़्ह में न्याय को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। कुरआन में स्पष्ट रूप से आदेश दिया गया है कि “निस्संदेह अल्लाह तुम्हें न्याय और भलाई का आदेश देता है।” इस्लामी व्यवस्था में शासक और आम नागरिक, सभी कानून के सामने बराबर होते हैं और किसी को भी विशेषाधिकार प्राप्त नहीं होता। हज़रत उमर (रज़ि.) के दौर की अनेक घटनाएँ इस बात की गवाही देती हैं कि न्याय में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता था। इसी प्रकार भारतीय लोकतंत्र भी ‘कानून का शासन’ (Rule of Law) पर आधारित है, जहाँ हर नागरिक को समान अधिकार प्राप्त है और न्यायपालिका स्वतंत्र रूप से कार्य करती है। इस प्रकार दोनों व्यवस्थाओं में न्याय और समानता एक साझा मूल्य के रूप में सामने आते हैं।

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू परामर्श और जनभागीदारी का है। इस्लामी फ़िक़्ह में “शूरा” (परामर्श) का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसके अंतर्गत शासक को महत्वपूर्ण मामलों में विद्वानों और जनता से सलाह लेना आवश्यक होता है। कुरआन में कहा गया है कि “उनके कार्य आपसी मशवरे से चलते हैं।” ख़िलाफ़त-ए-राशिदा के दौर में यह सिद्धांत पूर्ण रूप से लागू था। भारतीय लोकतंत्र में भी यही विचार ‘जनतंत्र’ के रूप में मौजूद है, जहाँ जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है और सरकार उनके माध्यम से चलती है। संसद, चुनाव और जनप्रतिनिधित्व इस सिद्धांत की व्यावहारिक अभिव्यक्ति हैं। इस दृष्टि से शूरा और लोकतंत्र दोनों का उद्देश्य जनता की भागीदारी सुनिश्चित करना है।

तीसरा पहलू मानवाधिकारों का है। इस्लामी फ़िक़्ह में मानव जीवन, संपत्ति, सम्मान और धर्म की रक्षा को मूलभूत अधिकार माना गया है, जिन्हें “मक़ासिद-ए-शरीअत” कहा जाता है। हज के अंतिम ख़ुत्बे में पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इन अधिकारों की स्पष्ट घोषणा की थी। भारतीय संविधान भी मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) के माध्यम से नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और जीवन के अधिकार की गारंटी देता है। इस प्रकार दोनों व्यवस्थाएँ मानव गरिमा और अधिकारों की रक्षा पर बल देती हैं।

चौथा महत्वपूर्ण पहलू जवाबदेही (Accountability) का है। इस्लामी व्यवस्था में शासक जनता के प्रति उत्तरदायी होता है और उसे अपने कार्यों का हिसाब देना पड़ता है। हज़रत अबू बन (रजि.) का यह कथन कि” यदि मैं सही राह पर चलूँ तो मेरा साथ दो और यदि मैं भटक जाऊँ तो मुझे सुधारों जवाबदेही की एक उत्कृष्ट मिसाल है। भारतीय लोकतंत्र में भी सरकार संसद, न्यायपालिका, मीडिया और जनता के प्रति जवाबदेह होती है। चुनाव प्रणाली के माध्यम से जनता को सरकार को बदलने का अधिकार प्राप्त है, जो जवाबदेही का एक सशक्त माध्यम है।

पाँचवाँ पहलू सामाजिक न्याय और कल्याण का है। इस्लामी फ़िक़्ह में ज़कात, सदक़ा और अन्य आर्थिक व्यवस्थाओं के माध्यम से गरीब और कमजोर वर्गों की सहायता सुनिश्चित की जाती है। इस्लामी राज्य का उद्देश्य एक ऐसा समाज बनाना है जहाँ गरीबी और शोषण का अंत हो। इसी प्रकार भारतीय लोकतंत्र में भी विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं, आरक्षण नीतियों और सामाजिक न्याय कार्यक्रमों के माध्यम से पिछड़े वर्गों के उत्थान का प्रयास किया जाता है। इस प्रकार दोनों व्यवस्थाएँ सामाजिक समानता और जनकल्याण को बढ़ावा देती हैं।

हालाँकि इन समानताओं के बावजूद कुछ अंतर भी मौजूद हैं। इस्लामी फ़िक़्ह एक दैवीय व्यवस्था है जिसकी नींव ईश्वरीय मार्गदर्शन पर आधारित है, जबकि भारतीय लोकतंत्र एक मानवीय व्यवस्था है जो समय और परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होती रहती है। इस्लामी व्यवस्था में शरीअत को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, जबकि लोकतंत्र में संसद को कानून बनाने का अधिकार होता है। इसी प्रकार इस्लामी फ़िक़्ह में धर्म का केंद्रीय स्थान है, जबकि भारतीय लोकतंत्र धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों पर आधारित है।

इसके अतिरिक्त इस्लामी फ़िक़्ह में नैतिकता और कानून को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जाता, बल्कि दोनों को एक समन्वित व्यवस्था के रूप में देखा जाता है, जबकि लोकतांत्रिक प्रणाली में कानून और नैतिकता के बीच एक स्पष्ट अंतर पाया जाता है। इसी तरह इस्लामी व्यवस्था में सर्वोच्च सत्ता अल्लाह को प्राप्त है, जबकि लोकतंत्र में सत्ता जनता के हाथों में होती है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि इस्लामी फ़िक़्ह और भारतीय लोकतंत्र, भले ही अपनी संरचना और आधार में भिन्न हों, लेकिन न्याय, समानता, जनभागीदारी, जवाबदेही और मानवाधिकार जैसे मूलभूत सिद्धांतों में एक-दूसरे के निकट दिखाई देते हैं। यदि इन साझा मूल्यों को समझकर व्यवहार में लाया जाए तो एक ऐसा समाज निर्मित किया जा सकता है जो न केवल न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण हो, बल्कि आपसी सम्मान, सहिष्णुता और सामंजस्य का भी प्रतीक बने।

(लेखक शहाबुद्दीन, दिल्ली के एक स्वतंत्र इस्लामिक विचारक और चिंतक हैं।)

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