भिलाई, देश की समृद्धि सांस्कृतिक विरासत में देश भर के लोगों की अभिव्यक्ति के रुप भाषाओं की विविधताओं सहित उसमें समाहित सांस्कृतिक अस्मिता और भारतीय ज्ञान परंपरा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचानने तथा उसे आने वाली पीढ़ियों में हस्तांतरित करने की दृष्टि से गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय कोनी बिलासपुर के अंग्रेजी विभाग द्वारा दो दिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का आयोजन रजत जयंती सभागार में किया गया।
जहां छत्तीसगढ़ के सेवानिवृत्त प्रधान पाठक, जनजाति शोधार्थी एवं लोक संस्कृति कर्मी राम कुमार वर्मा द्वारा घुमंतु समुदाय पारधियों में प्रचलित गुप्त भाषा ‘वागरी’ की कहानियों में संरक्षित श्रेष्ठ सांस्कृतिक स्मृतियों को देश भर के आए शोधार्थियों एवं छत्तीसगढ़ के महाविद्यालयीन विद्यार्थियों के समक्ष रंगीन स्लाइडों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। इसमें विशेष रुप से पारधियों की भाषा वागरी में उनके पुरखों द्वारा बताई गई गोत्र उत्पत्ति की कथाओं, कुरगुल, टिटोड़ी गोत्र, लखनिया-लोझनिया, दुलसिया बहन,निर्धनिया भाई, गेरुआ नदी, रानी मलागर, काकरिया कोठ, कायल-पियल गाय, राजा घुसघुस, उड़न पॅंखी घोड़ा, रामा पारधी, सीता राम पारधी, अमर शहीद राजा समशेर सिंह पारधी, पारधी बेटी पद्म विभूषित डॉ. तीजन बाई द्वारा अपने नाना बृजलाल पारधी से ‘पारधन’ गाथाओं व काया खंडी भजनों को सुनकर ‘मारखा’ भाषा यानी छत्तीसगढ़ी भाषा में पंडवानी की कथाओं को कापालिक शैली में श्रेष्ठतापूर्वक गा कर विश्व पटल पर स्थापित कर सर्वोच्च नागरिक सम्मान प्राप्त करने की पारधी पुरखों की सांस्कृतिक स्मृतियों में सुरक्षित होने की बात को प्रमाणित तौर पर रखा गया।

इसे उपस्थित शोधार्थियों सहित संगोष्ठी के संयोजक प्रो. प्रसेनजीत पांडा, प्रो. अनुराग चौहान, प्रो. मनीष श्रीवास्तव सहित समापन सत्र के विशिष्ट अतिथि प्रो. आर सुब्रमण्यम, प्रो. पवन कुमार राय, सीमा ने काफी प्रशंसित किया। समापन समारोह की मुख्य अतिथि प्रो. नीलम्बरी दवे एवं कुल सचिव प्रो. आलोक चक्रवाल ने प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया। प्रस्तुत शोध अध्ययन को तैयार करने में पारधी समुदाय के प्रदेश अध्यक्ष चैतराम मालिया, जिला अध्यक्ष सुरेश पारधी , राजा पारधी अमित पारधी, केवल राम पारधी, चंद्रिका पारधी, बुधियारीन पारधी, कमला पारधी, सविता पारधी आदि ने सहयोग किया।
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