विनोद कुमार शुक्ल याद किए गए, जन संस्कृति मंच के शोक सभा में जुटे साहित्यकार
भिलाई, सुप्रसिद्ध कवि कथाकार एवं ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल के निधन से संपूर्ण साहित्य जगत में रिक्तता और मायूसी का माहौल है। उनका विपुल साहित्य और सादगी भरा जीवन रचनाकारों के लिए प्रेरणापुंज है। उनकी स्मृति में जन संस्कृति मंच दुर्ग-भिलाई इकाई ने शोक सभा का आयोजन हिंदी डिजिटल कक्ष कल्याण महाविद्यालय भिलाई में किया। उपस्थित साहित्यकारों और पाठकों ने शुक्ल को शिद्दत से याद कर श्रद्धांजलि अर्पित की।
आलोचक सियाराम शर्मा ने विनोद कुमार से जुड़े अपने अमूल्य पलों को याद किया। उन्होंने कहा कि एक बड़ा रचनाकार वह होता है, जो किसी समाज, देश के जीवन की लय को पकड़ लेता है। छत्तीसगढ़ के जीवन का मंथर लय विनोद जी की रचनाओं में खूब दिखाई देता है।आदिवासियों के जीवन संघर्ष और भय को लेकर मुख्यधारा के सशक्त कवियों में विनोद कुमार अग्रणी हैं।
कवि परमेश्वर वैष्णव ने याद करते हुए कहा “उनका सहसा जाना छत्तीसगढ़ सहित समूचे विश्व के लिए अपूरणीय क्षति है।”
प्रसिद्ध कथाकार कैलाश बनवासी ने उनके व्यक्तित्व के माध्यम से अपने सपनों की दुनिया रचने की विनोद की ललक की चर्चा की। उन्होंने कहा कि विनोद की रचनाओं में छत्तीसगढ़िया की सुगंध बसी है।
अंचल के जाने-माने कथाकार लोकबाबू ने अपने संस्करणों में विनोद जी को याद किया।
कवयित्री पूर्णिमा साहू ने विनोद कुमार शुक्ल का संक्षिप्त जीवन परिचय प्रस्तुत किया। उन्होंने शुक्ल को समर्पित अपनी कविता ‘सायकिल’ का पाठ भी किया।
रंगकर्मी शालिनी त्रिपाठी ने शुक्ल को काव्यमयी श्रद्धांजलि अर्पित की।
अंचल के विशिष्ट कवि घनश्याम त्रिपाठी ने शुक्ल से अपने पहले मिलन के अनुभव को साझा किया।

युवा आलोचक अंबरीश त्रिपाठी ने शुक्ल के साथ अपनी स्मृतियों को व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि वे एक सर्जक थे और सर्जना के माध्यम से वे हमारे बीच हमेशा मौजूद रहेंगे।
रचनाकार मीना गुप्ता ने कहा कि यथार्थ को देखने का उनका अपना एक नज़रिया था।
अभिषेक पटेल ने ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ उपन्यास के माध्यम से विनोद जी की भाषागत विशिष्टताओं को रेखांकित किया।
प्रसिद्ध शायर मुमताज ने लीलाधर मंडलोई, विष्णु नागर के साथ विनोद से आत्मीय मिलन की स्मृतियों को साझा किया।
कवि विजय वर्तमान ने विनोद पर केंद्रित अपनी कविता का पाठ किया।
शायर नौशाद सिद्दीकी ने शेर पढ़ते हुए श्रद्धांजलि दी-
ग़म में डूबी हुई ये फिजाएं हैं, सिसकियां लेती अब ये हवाएं हैं।
रूह विनोद कुमार शुक्ल की सुकून पा जाए सब के होठों पे ये दुआएं हैं।
इस श्रद्धांजलि सभा में वरिष्ठ पत्रकार हरिभूमि के विमल शंकर झा और दिव्या ने भी विनोद कुमार शुक्ल पर प्रकाश डालते हुए उनकी साइकिल और दीवार में एक खिड़की थी उपन्यास पर प्रकाश डालीं।
श्रद्धांजलि सभा का संचालन अशोक तिवारी तथा धन्यवाद ज्ञापन एन. पापाराव ने किया।


