“साहित्य समाज की आत्मा है, संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है और मानवता को जोड़ने वाला सबसे सशक्त माध्यम है”
भिलाई, रिसाली स्थित होटल समायारा इन में साहित्य, संस्कृति, चिंतन और सृजन का अनुपम संगम
भिलाई, प्रगतिशील जन-विचारधारा की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के तत्वावधान में रिसाली (जिला दुर्ग) स्थित होटल समायारा इन में आयोजित एक दिवसीय विराट साहित्यिक समारोह साहित्य, संस्कृति, चिंतन, संवाद और सृजन का अनुपम संगम बनकर सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से आए साहित्यकारों, कवियों, शायरों, शिक्षाविदों, समाजसेवियों, प्रशासनिक अधिकारियों, बुद्धिजीवियों तथा साहित्य प्रेमियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
यह आयोजन केवल दो पुस्तकों के विमोचन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि साहित्यिक विमर्श, वैचारिक आदान-प्रदान, काव्य-पाठ, सम्मान समारोह, सांस्कृतिक समरसता तथा रचनात्मक चेतना का एक सशक्त मंच बन गया। पूरे दिन चले इस आयोजन में साहित्य के विविध आयामों पर सारगर्भित चर्चा हुई और उपस्थित जनों ने इसे दुर्ग-भिलाई अंचल के महत्वपूर्ण साहित्यिक आयोजनों में से एक बताया।

कार्यक्रम दो सत्रों में आयोजित किया गया। प्रथम सत्र : कृति विमोचन एवं साहित्यिक परिचर्चा। प्रथम सत्र में सुप्रसिद्ध बांग्ला कवि प्रकाशचंद्र मण्डल की बहुचर्चित बांग्ला काव्य कृति ‘एखोने अनेकटा पथ चोलते बाकी’ (हिंदी शीर्षक – ‘अभी अनेकों सफर तय करना बाकी है’) तथा वरिष्ठ हिंदी कवि डॉ. विजय कुमार गुप्ता ‘मुन्ना’ की सातवीं काव्य कृति ‘सृजन पल का काव्यकुंड’ का गरिमामय वातावरण में विधिवत लोकार्पण किया गया।
समारोह के मुख्य अतिथि खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष एवं कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त राकेश पाण्डेय थे। विशिष्ट अतिथि के रूप में हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग के कुलसचिव डॉ. भूपेंद्र कुलदीप उपस्थित रहे, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता छत्तीसगढ़ रत्न डॉ. शिरोमणि माथुर ने की।
दोनों सत्रों में विशेष रूप से मंचासीन रहे ‘आरंभ’ के मुख्य सलाहकार, संस्कृत आयोग के पूर्व सदस्य एवं प्रख्यात विद्वान आचार्य डॉ. महेशचंद्र शर्मा, जिनकी गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन को विशेष ऊँचाई प्रदान की।
साहित्य समाज को दिशा देता है – राकेश पाण्डेय। मुख्य अतिथि राकेश पाण्डेय ने अपने उद्बोधन में कहा कि साहित्य किसी भी समाज की वैचारिक चेतना का आधार होता है। उन्होंने कहा—

“‘आरंभ’ का उद्देश्य अनुकरणीय है। आज यहाँ आकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हुई। साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और संवेदनशील व्यक्तित्वों के बीच विचारों का आदान-प्रदान हुआ तथा मन के भावों को व्यक्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ऐसे आयोजन समाज में सकारात्मक चिंतन, सांस्कृतिक जागरूकता और रचनात्मक वातावरण का निर्माण करते हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि साहित्य समाज को केवल दर्पण नहीं दिखाता बल्कि उसे दिशा भी देता है। जब समाज में संवाद कम होने लगता है, तब साहित्य संवाद का सबसे विश्वसनीय माध्यम बनकर सामने आता है।
युवा पीढ़ी का साहित्य से जुड़ना शुभ संकेत – डॉ. भूपेंद्र कुलदीप। विशिष्ट अतिथि डॉ. भूपेंद्र कुलदीप ने कहा। “साहित्यकार समाज को दिशा देते हैं। आज के समय में युवा पीढ़ी का साहित्य से जुड़ना अत्यंत आशाजनक और सुखद संकेत है। ‘आरंभ’ जैसी संस्थाएँ साहित्य और समाज के बीच सशक्त सेतु का कार्य कर रही हैं। ऐसे आयोजनों से नई पीढ़ी को प्रेरणा मिलती है और साहित्यिक वातावरण का विस्तार होता है।”
उन्होंने विश्वविद्यालयों और साहित्यिक संस्थाओं के मध्य सतत संवाद की आवश्यकता पर भी बल दिया।
साहित्य मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने की शक्ति है – डॉ. शिरोमणि माथुर। अध्यक्षीय उद्बोधन में छत्तीसगढ़ रत्न डॉ. शिरोमणि माथुर ने कहा कि साहित्य केवल शब्दों का संयोजन नहीं बल्कि मनुष्य के जीवन अनुभवों, संघर्षों, सपनों, संवेदनाओं और मूल्यों की अभिव्यक्ति है। साहित्य मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने की शक्ति देता है और समाज को मानवीय बनाता है।

सर्वधर्म प्रार्थना ने बाँधा सौहार्द का स्वर। कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इसके पश्चात डॉ. रजनी नेलसन द्वारा गाया गया सर्वधर्म प्रार्थना—
“तू ही राम है, तू रहीम है, तू करीम, कृष्ण, खुदा हुआ।
तू ही वाहे गुरु, तू यीशु मसीह, हर नाम में तू समा रहा…”
का सामूहिक गायन डॉ.रजनी नेलसन क ताल में ताल मिलाकर गाया गया।
सभागार में उपस्थित सैकड़ों साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों एवं अतिथियों ने खड़े होकर इस प्रार्थना में सहभागिता की। यह दृश्य कार्यक्रम का अत्यंत भावपूर्ण और स्मरणीय क्षण बन गया। प्रार्थना ने धार्मिक समरसता, राष्ट्रीय एकता और मानवीय सद्भाव का प्रभावी संदेश दिया।
कृतियों की समीक्षाओं ने खोले साहित्यिक आयाम
बांग्ला काव्य कृति ‘अभी अनेकों सफर तय करना बाकी है’ की समीक्षा वरिष्ठ साहित्यकार सरला शर्मा ने प्रस्तुत की। उन्होंने कृति को जीवन संघर्ष, आशा, धैर्य और सतत गतिशीलता का सशक्त काव्य दस्तावेज बताया।
वहीं डॉ. अजय आर्य ने ‘सृजन पल का काव्यकुंड’ की समीक्षा करते हुए कहा कि यह कृति जीवन, समाज, प्रकृति, राष्ट्रप्रेम, मानवीय संबंधों और समकालीन चिंताओं की विविध भावभूमियों को समेटे हुए है।
दोनों कृतिकारों का हुआ विशेष सम्मान

दोनों कृतिकारों को पुष्पवर्षा के मध्य मंच तक ससम्मान लाया गया। मंच पर उनकी धर्मपत्नियों सुमिता मण्डल एवं शशिप्रभा गुप्ता को भी सम्मानपूर्वक स्थान प्रदान किया गया।
नोटों की मालाओं, विशेष रूप से तैयार किए गए आकर्षक गुलदस्तों तथा स्मृति-चिह्नों द्वारा दोनों साहित्यकारों का अभिनंदन किया गया। इस अवसर पर उन्हें ‘आरंभ साहित्य गौरव सम्मान’ से सम्मानित किया गया।

सम्मान-पत्र का वाचन प्रदीप भट्टाचार्य एवं रत्ना नारमदेव ने किया।आरंभ का उद्देश्य केवल आयोजन नहीं, साहित्यिक चेतना का विस्तार
‘आरंभ’ के अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य ने स्वागत उद्बोधन दिया।संस्था के मुख्य संरक्षक कैलाश जैन बरमेचा ने आयोजकीय वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि ‘आरंभ’ का उद्देश्य केवल साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित करना नहीं, बल्कि समाज में स्वस्थ विचार, सकारात्मक संवाद, सांस्कृतिक चेतना, मानवीय मूल्यों और साहित्यिक संस्कारों का विस्तार करना है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में साहित्य की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है और समाज को ऐसे मंचों की आवश्यकता है जहाँ विचार, संवेदना और सृजन का सतत प्रवाह बना रहे।
द्वितीय सत्र : काव्य पाठ एवं साहित्यिक संध्या द्वितीय सत्र में आयोजित काव्य पाठ एवं साहित्यिक संध्या कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण रही। इस सत्र की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध कथाकार डॉ. परदेशीराम वर्मा ने की। विशिष्ट अतिथियों में डॉ. आर.पी. अग्रवाल, अब्दुल वहीद खान तथा नीलमचंद सांखला शामिल थे।
अपने उद्बोधन में डॉ. परदेशीराम वर्मा ने कहा—। “कविता की एक परिभाषा यह भी है कि प्रभावी और सुंदर उक्ति भी कविता होती है। यही कारण है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू का गद्य और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के अनेक उद्बोधन भी काव्यमय माने जाते हैं।”
इसके पश्चात विभिन्न कवियों एवं शायरों ने गीत, ग़ज़ल, मुक्तक, नवगीत, सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रचनाएँ तथा समकालीन विषयों पर आधारित काव्य प्रस्तुत किए। श्रोताओं ने तालियों की गड़गड़ाहट से रचनाकारों का उत्साहवर्धन किया।
बहुभाषी साहित्यिक संगम बना आयोजन। इस आयोजन की विशेषता यह रही कि इसमें हिंदी, उर्दू और बांग्ला साहित्य से जुड़े रचनाकारों की उल्लेखनीय सहभागिता रही। विभिन्न भाषाओं और साहित्यिक विधाओं से जुड़े रचनाकारों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को बहुभाषी साहित्यिक संगम का स्वरूप प्रदान किया।
महिला साहित्यकारों की सक्रिय भागीदारी ने आयोजन को और अधिक समृद्ध एवं प्रभावशाली बनाया।
डॉ. बशीर बद्र को श्रद्धांजलि। कार्यक्रम के समापन अवसर पर देश के सुप्रसिद्ध उर्दू शायर डॉ. बशीर बद्र के हालिया निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया गया। उपस्थित जनों ने मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके साहित्यिक अवदान को नमन किया।
राष्ट्रगान के साथ हुआ समापन। प्रथम सत्र का आभार प्रदर्शन अनिता करडेकर तथा द्वितीय सत्र का आभार प्रदर्शन त्रयम्बक राव साटकर ‘अंबर’ ने किया।

राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक चेतना और साहित्यिक ऊर्जा के वातावरण के बीच कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।
इस अवसर पर दुर्ग-भिलाई अंचल सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए अनेकों साहित्यकार, कवि, शायर, शिक्षाविद, बुद्धिजीवी, समाजसेवी एवं गणमान्य नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। उपस्थित प्रमुख जनों में आलोक कुमार चंदा, ब्रजेश मल्लिक, पल्लव चटर्जी, ठाकुर दशरथ सिंह भुवाल, त्रयम्बक राव साटकर ‘अंबर’, शायर सुशील यादव, कमलेश चंद्राकर, शेफाली भट्टाचार्य, मंजू कैलाश जैन बरमेचा, बानी चक्रवर्ती, स्मृति दत्त, जाविद हसन ‘भाईजान’, शौकत इकबाल, डॉ. इकबाल खान ‘तन्हा’, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, विपुल कुमार सेन, जीवन चंद्र हालदार, घनश्याम कुमार देवांगन, डॉ. संध्या श्रीवास्तव, वर्षा ठाकुर, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, शुचि ‘भवि’, माला सिंह, डॉ. संतोष राय, मिताली श्रीवास्तव वर्मा, पुलक सेनगुप्ता, सुदीप विश्वास, परितोष बनिक, मीता बनिक, गोविंद बर्मन, अनुभव कुमार मण्डल, हेमंत जगम, अविनाश पाटिल, विजयश्री पाटिल, नवेद रजा दुर्गवी, डॉ. रौनक जमाल, चंद्रशेखर पांडे, सुधीर पाटणकर, तुलसी सोनी, जाहिद खान, ईश्वर सिंह राजपूत, दिनेश जैन, डॉ. मानसी गुलाटी, संगीता मिश्रा, दिलीप बरमेचा, श्रेयांश बरमेचा, रत्ना नारमदेव, आशुतोष माथुर, निरुपमा माथुर, रश्मि अग्रवाल, आकांक्षा मिश्रा, अनीता तिवारी, राजकुमार भल्ला ‘आर्य’, जलज ताम्रकर, राकेश गुप्ता ‘रुसिया’, राहुल साहू, रोहितास सिंह भुवाल, प्रिंस चंद्रा, संध्या साटकर, जी.एस. बर्मा, गीता रानी बर्मा, जितेंद्र श्रीवास्तव, कृष्णा राव एवं अनेक प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।





