ठूंठ में बदला इमली बगीचा का पेड़, कटती हरियाली पर खामोश प्रशासन

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भिलाई,  भिलाई-3 का कभी प्रसिद्ध रहा इमली बगीचा अब केवल यादों की परछाईं बनकर रह गया है। जिस पेड़ की छांव में कभी पीढ़ियां पली-बढ़ीं, वही आज एक सूखे ठूंठ में बदलकर खड़ा है मानो अपनी ही मौत का मौन गवाह बन गया हो। इमली बगीचा के नाम पर पूरा मोहल्ला ही था। जो वर्तमान में इंदिरापारा व शांतिनगर के बीच का हिस्सा है।

स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि एक समय यहां इमली के घने पेड़ों का पूरा बगीचा हुआ करता था। बच्चे इमली तोड़ते, लोग पेड़ों की ठंडी छांव में बैठकर सुस्ताते और राहगीर यहां कुछ पल सुकून के बिताते थे। इस पेड़ से जुड़ी लोककथाएं भी मशहूर थीं, कहा जाता था कि रात में यहां भूत-प्रेत का साया रहता है, इसलिए लोग अकेले गुजरने से डरते थे। डर की वही कहानियां भी इस पेड़ की पहचान का हिस्सा थीं।
लेकिन समय के साथ बगीचा गायब हो गया। हरियाली की जगह मकानों ने ले ली और प्रकृति की जगह कंक्रीट उग आया। अंत में केवल दो इमली के पेड़ ही बचे थे, जो बीते समय की आखिरी निशानी थे। अब उनमें से एक को निर्माण की आड़ में इस तरह काट दिया गया कि उसकी सारी हरियाली छीन ली गई और वह केवल ठूंठ बनकर रह गया।
हैरानी की बात यह है कि यह सब होते हुए भी जिम्मेदार प्रशासन की ओर से कोई ठोस पहल नजर नहीं आई। सवाल उठता है कि शहर की पहचान रहे पेड़ों को बचाने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? क्या विकास के नाम पर हरियाली का यूं खत्म हो जाना ही अब नई व्यवस्था बन गई है?

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प्रकृति प्रेमियों का कहना है कि यह केवल एक पेड़ का अंत नहीं, बल्कि शहर की स्मृतियों, संस्कृति और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता के खत्म होने की कहानी है। अगर अब भी चेतना नहीं आई, तो आने वाली पीढ़ियां शायद यकीन ही नहीं कर पाएंगी कि यहां कभी “इमली बगीचा” हुआ करता था—जहां पेड़ों की छांव थी, बचपन था और शहर की एक जीवित पहचान थी।

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