राष्ट्रीय एकता, नागरिकता और इस्लाम

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भिलाई, भारत की धरती सदियों से विभिन्न सभ्यताओं, धर्मों, विश्वासों और विचारधाराओं का पवित्र संगम रही है। इस देश की खूबसूरती गहरी तरह से उसकी विविधता और गंगा-जमुनी तहजीब में जड़ी-बुनी है। भारतीय
संविधान ने इस इस देश की आत्मा को “लोकतंत्र”, “समानता” और “वैश्विकता” (Secularism) के सुनहरे धागों में बुन दिया है। जब हम इस्लामी शिक्षाओं का गहन अध्ययन करते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने “देशभक्ति” और “वैश्विक भाईचारे” को बहुत ही उच्च स्थान दिया है। भारतीय मुसलमानों के लिए यह धरती केवल एक भौगोलिक क्षेत्र या मिट्टी का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह उनके पूर्वजों का आश्रय स्थान, उनकी पूजा-अर्चना के केंद्रों का घर और उनकी पहचान का एक अंग है। इतिहास में नागरिकता का पहला और पूर्ण व्यावहारिक ढांचा प्रopoक मुहम्मद (स.) ने 622 ईस्वी में “मदीना की चार्टर” (Charter of Medina) के रूप में प्रस्तुत किया था। मदीना के इस छोटे से राज्य में मुसलमान, यहूदी और अन्य जनजातियाँ रहती थीं। इस ऐतिहासिक संविधान में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि धार्मिक भेद-भाव के बावजूद, सभी समुदाय एक “उम्माह” (Ummah), अर्थात् एक साझा नागरिकता का हिस्सा होंगे।

जब हम भारतीय संदर्भ में नागरिकता की बात करते हैं, तो भारतीय संविधान यहाँ देश के हर नागरिक के लिए एक कवच और मार्गदर्शक के रूप में उभरता है। देश का संविधान किसी भी नागरिक के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करता है। मुस्लिम नागरिकों के संदर्भ में, संविधान की मूल भावना को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:

कानून के समक्ष समानता: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 देश के हर नागरिक को “कानूनों की समान सुरक्षा” प्रदान करता है। चाहे कोई बहुसंख्यक हो या अल्पसंख्यक, कानून की नजरों में सभी समान हैं। यह सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि नागरिकता या अधिकारों के मामले में किसी भी धर्म के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार न किया जाए।

मौलिक अधिकार : संविधान का भाग ।।। सभी भारतीय नागरिकों, जिसमें मुस्लिम नागरिक भी शामिल हैं, को छह मौलिक अधिकार प्रदान करता है:

● अनुच्छेद 15 और 16: ये अनुच्छेद धर्म, जाति, लिंग या जाति के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को कठोरता से प्रतिबंधित करते हैं और सरकारी रोजगार में समान अवसर प्रदान करते हैं।

● अनुच्छेद 25 से 28 (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) : ये अनुच्छेद हर नागरिक को अपने विश्वास को मानने, चलाने और प्रसारित करने की पूर्ण स्वतंत्रता देते हैं।

● अनुच्छेद 29 और 30 (सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकार) : ये अनुच्छेद अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति को संरक्षित करने का विशेष अधिकार देते हैं, साथ ही वे अपने शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना करने का अधिकार भी देते हैं।

मौलिक कर्तव्य: अधिकारों के साथ-साथ, संविधान का अनुच्छेद 51-A हर नागरिक पर कुछ मौलिक कर्तव्य भी लगाता है। मुस्लिम नागरिकों के लिए इन कर्तव्यों का पालन करना उनके विश्वास और देशभक्ति का हिस्सा है:

● देश के संविधान, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करना।

● देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करना।

● धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताओं को पार करते हुए सभी लोगों के बीच “पारस्परिक
भाईचारे” (सहज भाईचारे) और सामंजस्य को बढ़ावा देना।

● महिलाओं की गरिमा के विरुद्ध होने वाली प्रथाओं को त्यागना।

लोकतांत्रिक भागीदारी: भारत के लोकतंत्र में, हर मुस्लिम नागरिक के पास वोट देने और चुनाव लड़ने का समान अधिकार है। ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक, मुस्लिम समुदाय के देश की नीति निर्माण और राजनीतिक निर्णयों में सक्रिय भागीदारी यह प्रमाण है कि वे देश के भविष्य के निर्माताओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

हाल के वर्षों में, भारत की नागरिकता कानूनों में किए गए संशोधनों और प्रस्तावित दस्तावेज़ीकरण प्रक्रिया (NRC) ने देश के एक बड़े वर्ग, विशेष रूप से मुस्लिम जनसंख्या के हृदय में अनावश्यक डर, चिंता और आशंका पैदा की है।

चिंता और आपत्तियों के कारण: आवश्यक दस्तावेज़ों को साबित करने में असमर्थ होने की स्थिति में, गरीब और वंचित लोगों, विशेष रूप से मुसलिमों के बीच, अनाथ (stateless) बनने का डर पैदा हुआ।

शिकायतों के निवारण के लिए संवैधानिक तरीके: किसी भी लोकतांत्रिक देश में रायों का भेद और चिंताएं स्वाभाविक हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन शिकायतों के निवारण के लिए कौन सा मार्ग अपनाया जाता है। भारतीय संविधान ने हमें अपनी आवाज उठाने और न्याय प्राप्त करने के लिए अत्यंत तार्किक और शांतिपूर्ण साधन प्रदान किए हैं:

न्यायिक उपाय: संविधान का अनुच्छेद 32 नागरिकों को सीधे सर्वोच्च न्यायालय के पास जाने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 226 उन्हें उच्च न्यायालय के पास जाने का अधिकार देता है। CAA-NRC के मामले में भी, मुस्लिम संगठनों, विद्वानों और मानव अधिकार कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर हिंसा का सहारा लेने के बजाय देश के न्यायालयों का दरवाजा खटखटाया, जो सर्वोत्तम संवैधानिक प्रक्रिया है।

शांतिपूर्ण सभा का अधिकार: अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत, हर नागरिक के पास शांतिपूर्वक और अस्त्र-शस्त्र के बिना सभा करने और अपनी असहमति दर्ज करने का अधिकार है। हाल ही में, छात्रों और आम नागरिकों के व्यापक शांतिपूर्ण प्रदर्शनों और जनता के दबाव के चलते, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। यह घटना एक जीवंत प्रमाण है कि लोकतांत्रिक और संवैधानिक ढांचे के भीतर उठाई गई आवाज सरकारों को जवाबदेह बनाने में पूरी तरह प्रभावी साबित हो सकती है। संसद के सदस्यों, विधानसभा के सदस्यों और मानव अधिकार आयोगों के माध्यम से सरकार को अपनी राय संप्रेषित करना और कानूनों में बदलाव के लिए लोकतांत्रिक दबाव बनाना, एक ज़िम्मेदार नागरिक की पहचान है।

शांति, सहिष्णुता और पारस्परिक भाईचारा: भारत की ताकत विविधता में एकता में निहित है। इतिहास गवाह है कि सूफियों और संतों की यह धरती हमेशा प्रेम और पारस्परिक सहिष्णुता का संदेश देती रही है। राजनीतिक मतभेद और कानूनी बहसों को हमारे सदियों पुराने सामाजिक बुनावट पर हावी होने नहीं दिया जाना चाहिए। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन पड़ोसियों के बीच पारस्परिक विश्वास और भाईचारा ही देश की वास्तविक नींव है। शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए, डिजिटल युग में अफवाहों को रोकना और सरकार और जनता के बीच लगातार संवाद बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है ताकि किसी भी समुदाय में असुरक्षा का भाव विकसित न हो।

समय की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि नागरिकता जैसे अत्यंत संवेदनशील मुद्दों को राजनीतिक चश्मे को एक तरफ रखकर, केवल मानवीय, कानूनी और संवैधानिक दृष्टिकोण से हल किया जाए। किसी भी लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके अल्पसंख्यक कितने सुरक्षित और सशक्त महसूस करते हैं। जब तक देश के नागरिक अपने मौलिक कर्तव्यों का पालन करते हुए शांति बनाए रखते हैं, और जब तक देश का प्रणाली कानून के समक्ष समानता और मौलिक अधिकारों की रक्षा करती है, तब तक कोई भी कानून देश के सामाजिक बुनावट को नुकसान नहीं पहुंचा सकता। संवैधानिक ढांचे के भीतर रहते हुए शिकायतों के निवारण की मांग करना इस देश को शांति, विकास और समृद्धि के नए क्षितिजों की ओर ले जाएगा।

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