मीना गुप्ता का नया उपन्यास समाज, संस्कृति और नारी चेतना के ज्वलंत प्रश्नों को करता है उजागर

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“हुआ करते थे राधे” — एक परिवार की तीन पीढ़ियों के संघर्ष और संवेदना का सजीव दस्तावेज़

भिलाई, नई दिल्ली। साहित्य जगत में चर्चित लेखिका मीना गुप्ता का हाल ही में प्रकाशित उपन्यास ‘हुआ करते थे राधे’ पाठकों के बीच व्यापक चर्चा का विषय बना हुआ है। यह उपन्यास एक कस्बाई पृष्ठभूमि में बसे एक साधारण परिवार की तीन पीढ़ियों के उत्थान, पतन और संघर्ष की कहानी है, जिसे लेखिका ने बड़ी सहजता और आत्मीयता से प्रस्तुत किया है।

लेखिका मीना गुप्ता

जीवन से जुड़ी कहानी, जो उपन्यास से अधिक यथार्थ प्रतीत होती है

उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरल और प्रवाहपूर्ण भाषा है। घटनाक्रम इतना स्वाभाविक है कि पाठक को यह किसी काल्पनिक कथा की बजाय अपने आस-पास घटती हुई घटनाओं का बयान लगता है। लेखिका की शैली में वह आत्मीय संवाद है, जिससे पात्र और पाठक के बीच एक गहरा रिश्ता बन जाता है।

राधे — जिजीविषा, संघर्ष और आत्मसम्मान का प्रतीक

कहानी के केन्द्र में है राधे, एक साधारण वैश्य परिवार में जन्मा युवक, जिसे पिता की असामयिक मृत्यु के बाद बचपन से ही जिम्मेदारियों का बोझ उठाना पड़ता है।
राधे का संघर्ष केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक संकीर्णताओं और जातीय अहंकारों से भी टकराव का है।

जब वह अपने घर में शौचालय बनवाने का निर्णय लेता है, तो ठाकुर और ब्राह्मण वर्ग इसे “परंपराओं का अपमान” मानकर उसका बहिष्कार कर देते हैं।
गाँव में कानाफूसी शुरू हो जाती है —

“राधे घर मा खुड्डीघर बनवाये हैं… एक नहीं दुई-दुई! अब या बनिया घर मा हगी… मोहल्ला भ्रष्ट करी।”

इस विरोध और अपमान से आहत राधे रातों-रात गाँव छोड़ने का निर्णय कर लेता है। न माँ को बताता है, न पत्नी को — बस अपनी गरिमा के साथ नया जीवन आरंभ करने निकल पड़ता है।

संघर्ष से समृद्धि तक और फिर बिखराव तक

नई जगह राधे की मेहनत रंग लाती है। परिवार समृद्ध होता है, लेकिन बेटे की गैरजिम्मेदारी से यह समृद्धि धीरे-धीरे बिखरने लगती है।
निराश होकर राधे अपनी वसीयत पुत्रवधू के नाम कर देता है और अपनी पोतियों की शिक्षा पर पूरा ध्यान केंद्रित करता है। राधे का यह निर्णय समाज में नारी शिक्षा और सशक्तिकरण का सशक्त संदेश देता है।

लखनऊ पुस्तक मेले में उपन्यास का विमोचन करते अतिथि

नारी विमर्श और सामाजिक यथार्थ का सशक्त प्रस्तुतीकरण

मीना गुप्ता ने इस उपन्यास में स्त्री के संघर्ष, गृहस्थी में उसके योगदान, दहेज जैसी कुरीतियों और कन्या जन्म के प्रति समाज की मानसिकता पर तीखा प्रहार किया है।
राधे की पत्नी रानियां का पात्र इस संघर्षशील नारी का प्रतीक है, जो परिवार की धुरी बनकर सबको जोड़े रखती है।

साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कृति

‘हुआ करते थे राधे’ केवल एक पारिवारिक कथा नहीं, बल्कि समाज के बदलाव और मूल्यों के पुनर्निर्माण की कहानी है। यह उपन्यास इस बात का प्रमाण है कि कैसे एक लेखक सामान्य जनजीवन के अनुभवों से असाधारण साहित्य रच सकता है।

लेखिका की यह कृति आज के पाठकों को यह सोचने पर विवश करती है कि –

“समाज की प्रगति तभी संभव है, जब व्यक्ति अपने आत्मसम्मान और समानता के अधिकार के लिए खड़ा हो सके।”

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