नौशाद अहमद सिद्दीकी
होली आई होली आई, प्रफुल्लित तन और मन है।
मस्ती में डूबा आज हर एक जन है।
होली खेलो, गुलाल उड़ाओ रंग लो जीवन,
लेकिन ये भी याद रहे कि
जल ही तो है जीवन।
खीळ, बताशे, भांग की गुझिया,
खाएं और खिलाएं।
प्रेम का रंग डालें, दुश्मन पर,
उनको गले लगाएं।
हर्बल होली खेलें,
प्यार प्रीत का रंग बरसाएं।
इस होली में कसम खाएं,
पानी आप खूब बचाएं।।
दुश्मन को भी दोस्त बना दे ये होली,,,
प्यार के रंग में रंगा हुआ जो मन होता है,
उसका चर्चा हर घर हर आंगन होता है।
कुदरत भी तो खेला करती है होली,
बसंती रंगों से रंगा मधुबन होता है।
दुश्मन को भी दोस्त बना दे ये होली,
इस दिन मन में बहुत निरालापन होता है।
सारी उदासी बह जाती है रंगों में,
चेहरे पे मुस्कान आल्हादित मन होता है।
आम बौर आए और कोयल की आवाज गूंजे,पपिहा पीहू करे,
तो दिल में कितना रंग भरा मन होता है।
जब देवर, भाभी, जीजा साली होली खेलें,
फिर देखो लोगों कितना अपनापन होता है।
नौशाद समझते हैं जो मतलब होली का,
उनके आंगन में कवि सम्मेलन होता है।
नौशाद अहमद सिद्दीकी,
भिलाई तीन, चरोदा, छत्तीसगढ़


