सुरों के जादूगर मो. रफ़ी आ जाओ तुम्हें संगीत बुलाता है
पंजाब के अमृतसर के पास कोटला सुल्तानसिंग गाँव में एक फ़कीर मस्ती से गाता हुआ घूमता था और सात साल का एक नन्हा बच्चा उसकी आवाज़ के पीछे दीवानों की तरह सारा दिन घूमता रहता। शाम को घर आकर वो बच्चा उसी फ़क़ीर के अंदाज़ में गाने का प्रयास करता। उसके बड़े भाई हमीद ने उस बच्चे में छुपी प्रतिभा को पहचाना, उसकी लगन को समझा और उसे उस्ताद अब्दुल वहीद खान और उस्ताद बरकत अली खान के पास गाना सीखने भेज दिया। कड़ी मेहनत, लगन, अनुशासन और तपस्या से वो बच्चा एक होनहार गायक बनकर निकला, जिसे हम मोहम्मद रफ़ी के नाम से जानते है।
वर्ष 1940 में लाहौर में तत्कालीन गायक कुंदनलाल सहगल का कार्यक्रम था। अचानक लाइट चली गई, माइक बंद हो गया । लोगों ने शोरगुल मचाना शुरू कर दिया, तब हमीद ने नन्हे रफ़ी को स्टेज पर गाने बुला लिया। रफ़ी की सधी हुई गायकी और बुलंद आवाज़ सुन लोगों ने शोर बंद किया और तल्लीनता से गाना सुनने लगे। कार्यक्रम की समाप्ति पर स्वयं सहगल ने उस बच्चे को एक दिन बड़ा गायक बनने का आशीर्वाद दिया। इसके बाद हमीद भाई रफ़ी को लेकर मुंबई आ गए। संगीतकार श्यामसुन्दर ने वर्ष 1941 में अपनी पंजाबी फ़िल्म गुल बलोच के लिये रफ़ी से पहला गाना गवाया। इसके बाद संगीतकार नौशाद ने उन्हें अपने संगीत में गाने का मौका दिया। फिर काम नहीं मिलने से रफ़ी साहब ने कुछ फिल्मे जैसे..लैला मजनू / समाज को बदल डालो / जुगनू में अभिनय भी किया। वर्ष 1947 की फ़िल्म जुगनू में उन्होंने गायिका नूरजहाँ के साथ एक गीत गाया… यहाँ बदला वफ़ा का बेवफाई के सिवा क्या है। बस ये गाना और रफ़ी साहब की आवाज़ लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गई।
वर्ष 1947 में भारत पाकिस्तान का विभाजन हुआ। मो. रफ़ी का परिवार पाकिस्तान चला गया। लेकिन रफ़ी अपने भाई हमीदजी के साथ यहीँ मुंबई में रह गए। वर्ष 1948 में एक दुखद घटना हुई, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी की हत्या कर दी गई। गीतकार रजिन्दर कृशन ने सारी रात जागकर बापू की स्मृति में एक गीत लिखा… सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी। सुबह रफ़ी साहब की आवाज़ में इसे रेकॉर्ड किया गया और जब ये गीत रेडियो पर बजा तो सारा देश मो.रफ़ी की गायकी और उनकी आवाज़ का दीवाना हो गया। सभी अभिनेता, निर्माता,गीतकार और संगीतकार की पहली पसंद मो.रफ़ी बन गये। मुकेश को अपनी आवाज़ कहने वाले राजकपूर के लिये भी 1949 की फ़िल्म बरसात के गीत…मैं ज़िन्दगी में हरदम रोता ही रहा हूँ और 1952 की फ़िल्म अम्बर के लिये लताजी के साथ युगलगीत गाया.. हम तुम ये बहार, इसे राजकपूर पर ही फिलमाया गया।
रफ़ी साहब ने दो दशक तक फ़िल्म इंडस्ट्री पर अपनी आवाज़ से एकछत्र राज किया। उनके समकालीन गायक स्टूडियो के बाहर इंतज़ार करते थे कि रफ़ी साहब स्टूडियो खाली करें तो हमारी रिकॉर्डिंग हो जाये, लेकिन किसी के दिल में मो. रफ़ी के लिये जलन या बैर की भावना नहीं थी। उनके समकालीन किशोर कुमार पार्श्व गायन के साथ फिल्मों में अभिनय भी करते थे। लेकिन किशोर कुमार ने भी अनेकों बार रफ़ी साहब की आवाज़ का प्रर्श्वगायन लिया। इनमे मुख्य है 1956 की फ़िल्म भागमभाग के दो गीत.. यहाँ जो मस्त रात और भूलने वाली देख लिया। वर्ष 1957 की फ़िल्म पैसा ही पैसा में..ले लो सोने का लड्डू / 1958 में फ़िल्म रागिनी के लिये.. मन मोरा बावरा / 1959 फ़िल्म शरारत के लिये दो गीत.. तू मेरा साथी और अजब है दास्ताँ तेरी / 1961 में फ़िल्म प्रॉपर्टी के लिये गाया ओ मेरी मैना तू/1964 बागी शहज़ादा के लिये..इस मासूम चेहरे को और फिर 1972 में फ़िल्म प्यार दीवाना के लिये… अपनी आदत है सबको। मो.रफी के गाये भजन..बड़ी देर भई नन्दलाला / वृन्दावन का कृष्ण कन्हैया / इन्साफ का मन्दिर है ये / दुनिया ना भाये मोहे / ओ दुनिया के रखवाले / मुझे अपनी शरण में ले लो राम…दिल में भक्ति की एक मशाल जला जाते है। देशभक्ति गीतों में…अब कोई गुलशन ना उजड़े /जहाँ डाल डाल पर सोने की /वतन पे जो फ़िदा होगा /हम लाये है तूफ़ान से कश्ती / वतन की राह में / कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियो… हर सुनने वाले के दिल में देशप्रेम की ज्योत जला देते है। वहीं रूहानी गीत.. ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर / बा होशो हवास में दीवाना / अपनी आँखों में बसाकर /बेखुदी में सनम / मैं कहीं कवि न बन जाऊँ….इश्क़ की अनोखी दास्तां और बुलंदी बयां करते है।
सन 1970 में राजेश खन्ना अभिनीत फ़िल्म आराधना से किशोर कुमार की गायकी का नया युग शुरू हुआ। किशोर नाम की आंधी में कई दिग्गज गायकों के पैर उखड़ गये, लेकिन मो. रफ़ी एक मज़बूत चट्टान की तरह खड़े रहे, जिसका नतीजा था 1977 की फ़िल्म हम किसी से कम नहीं के गीत..क्या हुआ तेरा वादा के लिये उन्हें फ़िल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मो. रफ़ी ने सबसे ज़्यादा युगलगीत लता के साथ गाये। अभिनेताओं में उन्होंने शम्मीकपूर के लिए सबसे ज़्यादा गाने गाये। रफ़ी साहब ने छत्तीसगढ़ी फ़िल्म कहि देबे सन्देश के लिये पहली बार छत्तीसगढ़ी गीत गाया। फिर घरद्वार में उनका सुमन कल्याणपुर के साथ गाया युगलगीत.. सुन सुन मोर मया पीरा के..एक मील का पत्थर है।
मो. रफ़ी संगीतकार नौशाद की बहुत इज्जत करते थे, वो उन्हें अक्सर कहा करते थे..बहुत हुआ अब मुझको जाना चाहिए। किसको पता था कि 30 जुलाई 1980 को फ़िल्म आसपास के लिये अपना अंतिम गीत..शाम फिर क्यों उदास है, रेकॉर्ड करवाने के बाद दूसरे ही दिन 31 जुलाई को इस दुनिया को अलविदा कह जायेंगे, ये कहते हुए कि ‘ मुझको मेरे बाद ज़माना ढूंढेगा ‘। मो. रफ़ी के गाये लगभग 28000 गाने संगीत जगत की एक अनमोल धरोहर है, जो सदियों तक उनकी याद दिलाते रहेंगे।
उमेश कुमार सोनी ‘नयन’
लेखक आकाशवाणी के सेवानिवृत कर्मचारी है।


