रायपुर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने समाज से मन के भीतर मौजूद अलगाव और भेदभाव को समाप्त करने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि जो भी हिंदू है, वह एक है। सभी मंदिर, जलस्त्रोत और श्मशान गृह सबके लिए खुले रहने चाहिए। किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी जाति, संपत्ति या भाषा के आधार पर नहीं होना चाहिए। सामाजिक समरसता ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है।
सरसंघचालक भागवत रायपुर से 20 किलोमीटर दूर सोनपैरी गांव में आयोजित हिंदू सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि समाज में आने वाले संकट चाहे बांग्लादेश से जुड़ा विषय हो या परिवार की नई पीढ़ी से संबंधित समस्याएं, केवल चर्चा से हल नहीं होंगे। उनके समाधान के लिए सामूहिक प्रयास और ठोस कार्य आवश्यक हैं। सक्षम होने के बाद केवल विचार रखने की बजाय कुछ करके रास्ता बनाना होगा।
भागवत ने कहा कि अकेलापन व्यक्ति को व्यसनों की ओर ले जाता है। इससे बचने के लिए परिवार के भीतर संवाद बढ़ाना जरूरी है। संघ इसे मंगल संवाद और कुटुंब प्रबोधन कहता है। सप्ताह में कम से कम एक शाम परिवार के साथ बितानी चाहिए, जिसमें बातचीत, भजन और प्रेरक व्यक्तित्वों पर चर्चा हो। आदेश देने के बजाय सहमति बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए।
पर्यावरण संरक्षण पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि इसके उपाय घर से शुरू होने चाहिए। वर्षा जल संरक्षण, प्लास्टिक विरोधी जीवनशैली और पौधारोपण जैसे छोटे प्रयास बड़े बदलाव ला सकते हैं। स्वावलंबन के लिए स्वबोध आवश्यक है, इसलिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बजाय देशी उत्पादों को प्राथमिकता दें।
एम्स रायपुर में आयोजित युवा संवाद कार्यक्रम में भागवत ने कहा कि विकास जरूरी है, लेकिन वह पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना होना चाहिए। अरावली पर्वतमाला का उदाहरण देते हुए उन्होंने चेताया कि प्रकृति के विनाश का खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे छोटे-छोटे निर्णयों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण और समाज निर्माण की दिशा में आगे बढ़ें।


