नए साल पर एक ग़ज़ल,, फिर साल नया साथ मनाने के लिए आ….

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हर साल दिलासे हुए हम संग रहेंगे,
क्या-क्या हुआ अब के नहीं जाने के लिए आ

ग़ज़ल

रस्मों को जमाने में निभाने के लिए आ,
फिर साल नया साथ मनाने के लिए आ।
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बीते हुए लम्हे जहां तुमने था सताया,
रुसवाई का हर राज बताने के लिए आ।
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मकसद मुझें मालूम नहीं साल नए का,
पिछला था अगर कम तो सजाने के लिए आ।
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ऐ साल पुराने कई अहसान थे मेरे,
चाहत है जरा बाकी गिनाने के लिए आ।
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गुजरी सी उदासी तिरी देखी नहीं जाती,
आते हुए दिन फूल खिलाने के लिए आ।
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है पास जो यादों का जख़ीरा गए सालों,
मेरी उन्हीं यादों के खजाने के लिए आ।
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हर साल दिलासे हुए हम संग रहेंगे,
क्या-क्या हुआ अब के नहीं जाने के लिए आ।
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दम है तो मुझें छोड़ दे तन्हाई में हरदम,
उल्फ़त है अगर आग बुझाने के लिए आ।
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शायर सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)
          7000226712

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