दिवाली पूजन का सर्वश्रेष्ठ समय : शाम 7:30 से 7:42 बजे तक
भिलाई, 84 साल बाद Diwali पर बन रहा महासंयोग !
घर चलकर आएंगी मां लक्ष्मी।
वैदिक पंचांग गणना के अनुसार, साल 1941 में सोमवार 20 अक्टूबर को दीवाली मनाई गई थी। इस दिन अमावस्या का संयोग रात 08:50 तक था। इसके बाद प्रतिपदा तिथि शुरू हुई थी। वहीं, पूजा का समय भी रात 08:14 से लेकर रात 08:50 मिनट तक था।
जयपुर. पं. पुरुषोत्तम गौड़ ने बताया कि 20 अक्टूबर को अमावस्या तिथि में प्रदोष काल के साथ ही वृषभ और सिंह लग्न रहेगा। अतः इसी दिन दीपावली मनाना शास्त्रसम्मत रहेगा। वहीं, 21 अक्टूबर को शाम को प्रतिपदा तिथि शुरू हो जाएगी। ज्योतिषाचार्य पं. चंद्रमोहन दाधीच ने बताया कि 20 अक्टूबर को रातभर अमावस्या रहेगी। धर्मशास्त्रों के मुताबिक दोनों दिन प्रदोष व्यापिनी अमावस्या हो तो पहले दिन ही लक्ष्मी पूजन करना श्रेष्ठ रहेगा। सोमवार को वृषभ लग्न शाम 7.18 से रात्रि 9.15 बजे तक रहेगा। दिवाली के पूजन का सर्वश्रेष्ठ समय शाम 7.30 से 7.42 बजे तक रहेगा। इसमें प्रदोष काल के साथ ही स्थिर वृषभ लग्न भी रहेगा। सोमवार अर्धरात्रि बाद रात 1.48 से सुबह 4.04 बजे तक सिंह लग्न रहेगा।
सोमवार को प्रदोष, वृषभऔर सिंह लग्न का संयोग
दीपोत्सव 5 नहीं बल्कि पूरे 6 दिनों तक मनाया जाएगा । त्रयोदशी तिथि में बढ़ोतरी के कारण दीपोत्सव 6 दिनों का हुआ है, जिसमें त्रयोदशी तिथि दो दिन पड़ेगी । तिथि में घट-बढ़ के कारण त्योहारों के क्रम में भी अंतर हो जाता है ।
छह दिवसीय दीपोत्सव
18 अक्टूबरः धनतेरस (धन्वंतरि जयंती)
धन्वंतरिः देव देवो, वैद्यराज नमोस्तु ते
(धन्वंतरि स्तोत्र)
अर्थः आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वंतरि स्वास्थ्य, दीर्घायु और समृद्धि के प्रतीक हैं। धनतेरस पर दीप जलाकर रोग, दरिद्रता और दुःख दूर करने की प्रार्थना की जाती है। यह दिन स्वास्थ्य-आरोग्य के प्रति जागृति का संदेश देता है।
19 अक्टूबरः रूप चतुर्दशी (नरक चतुर्दशी)
कृष्णचतुर्दश्यां प्रातः काले अभ्यङ्गस्नानं कुर्यात्। येन नरकासुरवधः स्मर्यते तेन पापं नश्यति।
(स्कन्द पुराण, द्वारका माहात्म्य, अध्याय 4) अर्थः इस दिन स्नान और दीपदान से पापों का नाश होता है। हनुमानजी की पूजा से बल, रूप और तेज की प्राप्ति होती है। इस पर्व को आत्मशुद्धि और आंतरिक प्रकाश का प्रतीक माना गया है।
20 अक्टूबरः दीपावली (लक्ष्मी पूजन)
तमसो मा ज्योतिर्गमय। (बृहदारण्यक उपनिषद्)
अर्थः इस श्लोक से यह सीख मिलती है कि जब मन का अंधकार दूर होता है, तभी सच्ची लक्ष्मी, समृद्धि, ज्ञान और शांति जीवन में आती है।
21 अक्टूबरः देव-पितृकार्य अमावस्या
पितृदेवान् प्रसन्नान् तु ये पूज्यन्ते श्रद्धया।
(गरुड़ पुराण)
अर्थः इस दिन देवताओं और पितरों की पूजा का विधान है। पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर उनके आशीर्वाद से परिवार में सुख-शांति की वृद्धि होती है।
22 अक्टूबरः गोवर्धन पूजा
गोवर्धनधरं वन्दे, गोपालं गोपसङ्गिन्नम्।
(श्रीमद्भागवत पुराण)
अर्थः श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर प्रकृति और जीवों की रक्षा का संदेश दिया। यह पर्व पर्यावरण संरक्षण, सामूहिकता और सेवा-भाव का प्रतीक है।
23 अक्टूबरः भाईदूज (यम-यमुना मिलन)
भ्रातृद्वितीया यमुनायां, यमराजोऽभ्यागतः तवा। (स्कंद पुराण)
अर्थः इस दिन बहनें अपने भाइयों की दीर्घायु और रक्षा की प्रार्थना करेगी। भाई अपनी बहन की सुरक्षा का वचन देंगे। यह प्रेम, स्नेह और पारिवारिक एकता का उत्सव है।


