ईद-उल-अज़हा, कुर्बानी और कौमी जिम्मेदारियां

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ईद-उल-अजहा इस्लाम का एक महान त्योहार है, जो अपने भीतर अनेक आध्यात्मिक, नैतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय पहलुओं को समेटे हुए है। यह दिन हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की अद्वितीय कुर्बानी, आज्ञाकारिता और अल्लाह के आदेश के प्रति पूर्ण समर्पण की याद दिलाता है। इस दिन मुसलमान अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए जानवरों की कुर्बानी करते हैं, लेकिन यदि इस कार्य को केवल एक बाहरी रस्म समझ लिया जाए तो इसकी वास्तविक भावना और उद्देश्य समाप्त हो जाते हैं।

वास्तव में कुर्बानी एक ऐसी इबादत है जो मनुष्य के भीतर त्याग, ईमानदारी, सहानुभूति और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना उत्पन्न करती है तथा उसे व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित के बारे में सोचने की प्रेरणा देती है। पवित्र कुरआन में अल्लाह तआला फरमाता है:

न अल्लाह तक उनके मांस पहुँचते है और न उनका रक्त, बल्कि उस तक तुम्हारा तक़वा पहुँचता है। सूरह अल-हज्ज: 37

इस आयत से स्पष्ट होता है कि कुर्बानी का वास्तविक उद्देश्य दिखावा नहीं बल्कि सच्ची नीयत और अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करना है। जब एक मुसलमान सच्चे दिल से कुर्बानी करता है, तो वह अपनी इच्छाओं और स्वार्थों को अल्लाह की इच्छा के अधीन कर देता है। यही भावना उसे एक अच्छा इंसान और जिम्मेदार नागरिक बनाती है। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का जीवन त्याग और आज्ञाकारिता का महान उदाहरण है। कुरआन में इस घटना का वर्णन इस प्रकार है:

“फिर जब दोनों ने अल्लाह के आदेश के आगे सिर झुका दिया और इब्राहीम ने अपने पुत्र को पेशानी के बल लिटा दिया।” सूरह अस-साफ्फातः 103

कुर्बानी का एक महत्वपूर्ण पहलू उसका सामाजिक प्रभाव भी है। इस्लाम ने कुर्बानी के मांस को गरीबों और जरूरतमंदों में बाँटने की शिक्षा दी है। कुरआन में कहा गया है:

“उसमें से स्वयं भी खाओ और गरीब तथा जरूरतमंदों को भी खिलाओ।” सूरह अल-हज्ज: 28

यह शिक्षा हमें ऐसे समाज की ओर ले जाती है जहाँ खुशियाँ केवल अमीरों तक सीमित न रहें, बल्कि गरीब और वंचित लोग भी उनमें सहभागी बनें। इस प्रकार कुर्बानी सामाजिक समानता और भाईचारे का संदेश देती है। यदि हम कुर्बानी को व्यापक दृष्टिकोण से देखें तो यह केवल व्यक्तिगत इबादत नहीं बल्कि एक सामाजिक कार्य भी बन जाती है। ईद-उल-अज़हा के अवसर पर पशुपालकों, व्यापारियों और छोटे दुकानदारों को आर्थिक लाभ प्राप्त होता है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलती है। इस प्रकार कुर्बानी आध्यात्मिकता के साथ-साथ आर्थिक विकास का भी माध्यम बनती है। इस्लाम सामूहिक जिम्मेदारी का भी पाठ पढ़ाता है। अल्लाह तआला फरमाता है:

“नेकी और परहेज़गारी के कामों में एक-दूसरे की सहायता करो।” सूरह अल-माइदा: 2

यह आयत हमें केवल व्यक्तिगत इबादत तक सीमित रहने के बजाय, समाज और राष्ट्र की भलाई के लिए कार्य करने की प्रेरणा देती है। कुर्बानी इसी सामूहिक चेतना का प्रतीक है। कुर्बानी का एक और महत्वपूर्ण पक्ष स्वच्छता और अनुशासन है। इस्लाम में सफाई को अत्यधिक महत्व दिया गया है। हज़रत मुहम्मद ने फरमायाः

“पाकीज़गी आधा ईमान है।” सहीह मुस्लिम

इसलिए आवश्यक है कि कुर्बानी के बाद स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाए, ताकि पर्यावरण प्रदूषित न हो और बीमारियाँ न फैलें। यह केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी है। आज के समय में पर्यावरण संरक्षण भी एक महत्वपूर्ण विषय बन चुका है। कुरआन में कहा गया है:

“धरती में सुधार के बाद बिगाड़ पैदा मत करो। सूरह अल-आराफ: 56

इस आयत की रोशनी में हमें कुर्बानी के कार्य को इस प्रकार करना चाहिए कि पर्यावरण को कोई हानि न पहुँचे।

कुर्बानी का वास्तविक संदेश आत्ममंथन और आत्मसुधार है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम अपनी बुरी आदतों, स्वार्थ और अहंकार को त्याग सकते हैं? क्या हम सत्य, ईमानदारी और न्याय को अपने जीवन का हिस्सा बना सकते हैं? यदि हम ऐसा कर लें तो यही सच्ची कुर्बानी होगी। आज हमारा देश बेरोज़गारी, महँगाई, शैक्षिक पिछड़ेपन और सामाजिक असमानता जैसी अनेक समस्याओं का सामना कर रहा है। इन समस्याओं का समाधान केवल सरकारी प्रयासों में नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक के भीतर त्याग और सेवा की भावना उत्पन्न करने में है। हमें व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देनी होगी।

ईद-उल-अज़हा हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की महान कुर्बानी की याद दिलाती है। कुर्बानी इस्लाम की एक महत्वपूर्ण इबादत है, लेकिन इस्लाम मानवता की भलाई, शिक्षा और जरूरतमंदों की सहायता पर भी बल देता है। वर्तमान समय में कुछ लोग राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए कुर्बानी पर खर्च होने वाली राशि को गरीबों की शिक्षा, इलाज, अनाथों की सहायता और सामाजिक कल्याण के कार्यों में लगाने की बात करते हैं। इससे समाज के कमजोर वर्गों को सहारा मिल सकता है और राष्ट्र प्रगति की ओर बढ़ सकता है। हालांकि कुर्बानी की धार्मिक महत्ता अपनी जगह कायम है, इसलिए आवश्यक है कि धार्मिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाए रखा जाए।

यदि हम कुर्बानी के वास्तविक संदेश को अपने जीवन में उतार लें, तो हम एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं जो आर्थिक रूप से मजबूत होने के साथ-साथ नैतिक और आध्यात्मिक रूप से भी ऊँचा हो। साथ ही साथ यह हर मुसलमान के नैतिक कर्तव्य है कि वो एहतियात के साथ कुर्बानी को अंजाम दे और ईद के इस मौके को समाज के अन्य धर्मों के लोगों के साथ मेल जोल बढ़ाने के लिए प्रयोग करे।

(लेखक शहाबुद्दीन, दिल्ली के एक स्वतंत्र इस्लामिक विचारक और चिंतक हैं।)

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