लेखक- साजिद अली सतरंगी
भिलाई, मेरठ, एक रात की बात है। शहर की गलियां खामोश थी। हवा में ठंडक कम तन्हाई ज़्यादा घुली हुई थी। घर की दीवार पर लगा पुराना बल्ब टिमटिमा रहा था। “सादिक” मोबाइल हाथ में लिए आसमान की ओर ताक रहा था।
*”जैसे सितारों से नहीं बल्कि किसी आवाज़ से मुखातिब हो”*
कुछ महीने पहले तक उसकी यह रातें सबसे कीमती दौलत हुआ करती थी।
चंद महीने पहले ही “सादिक” की नई-नई मंगनी हुई थी। घर में खुशियों की मिठास थी। दीवारों पर नई रौशनी और दिल में अनकहे ख़्वाब ओर हर ख़्वाब में एक उम्र देखता था।
*”वो लड़की-जिसका नाम “सादिया” था।*
“सादिक” हर सुबह इस एहसास के साथ आँख खोलता कि अब उसकी ज़िंदगी में कोई है, जो सिर्फ़ उसका है।
मंगनी की अंगूठी उसकी उँगली में कम, दिल में ज़्यादा चुभती थी। मीठी सी चुभन, जो मुस्कुराने को मजबूर कर देती थी।
रातें उसकी सबसे प्यारी हुआ करती थीं। फ़ोन हाथ में, दिल धड़कनों से तेज़, और उधर उसकी मंगेतर-“सादिया”।
हर रोज़ घंटों गुफ़्तगू चलती। कभी बचपन की शरारतें, कभी आने वाली ज़िंदगी के नक़्शे,कभी नर्म शिकायतें तो कभी अनदेखे ख़्वाब।
*“हम छोटे से घर में भी ख़ुश रह लेंगे,” सादिया” कहती।*
*“बस तुम साथ हो,”सादिक” हँसकर जवाब देता।*
उन लम्हों में वक़्त मानों जैसे ठहर सा जाता। दुनिया सिमट कर सिर्फ़ दो आवाज़ों में बदल जाती।
“सादिक” के लिए “सादिया” सिर्फ़ मंगेतर नहीं थी।वो उसकी दुआ, उसकी तसल्ली, उसकी मुहब्बत, उसके जीने की, उम्मीद, बन चुकी थी।
“मगर ज़िंदगी हमेशा एक सी नहीं रहती।,,
धीरे-धीरे “सादिया” अपने काम में कुछ ज़्यादा ही मशरूफ रहने लगी।
पहले जो फ़ोन घंटों बजता था। अब वह मिनटों में ख़ामोश हो जाता।
पहले जो,,,,
*“अच्छा बताओ, दिन कैसा था?”*
पूछा जाता था, अब उसकी जगह *“अभी घर के काम में मशरूफ हूँ” ने ले ली।*
“सादिक” ने इसे समझने की लाख कोशिशें की।
“काम ज़रूरी है,” वो खुद को समझाता।
“ज़िम्मेदारियाँ बढ़ गई हैं,” दिल को तसल्ली देता।,,
“*मगर कुछ ख़ामोशियाँ तसल्ली नहीं मानतीं।*
अब फ़ोन पर अक्सर वही जुमले होते,,,
*“बाद में बात करेंगे।” थक गई हूँ।”*
*“कल कॉल करूँगी।”*
और वह “कल” कभी आता ही नहीं।
*”यह सच है मुहब्बत जहां दिल से की जाती है अक्सर तकलीफ़ भी वही ज़्यादा होती है वरना दिमाग़ वाले तो सिर्फ़ बहाना ढूंढ़ते हैं।”*
“सादिक” का दिल, जो कभी उसकी आवाज़ से बहल जाता था। अब उसी आवाज़ के इंतज़ार में उदास रहने लगा।,,
वो देर रात तक मोबाइल हाथ में लिए बैठा रहता। हर नोटिफ़िकेशन पर दिल उछल पड़ता मगर वो किसी और का मैसेज होता।
उसे याद आता कि कभी “सादिया” कहा करती थी,,,
*“अगर मैं बिज़ी भी रहूँ, तो तुम्हें एक मैसेज ज़रूर करूँगी।”*
आज वही “सादिया” घंटों ग़ायब रहती थी। ओर उसका हर एक वादा कही छूट रहा था।
एक रात उसने हिम्मत कर के कहा,,
*“सादिया,, तुम्हें मुझसे बात करने का वक़्त नहीं मिलता क्या?”*
उधर कुछ पल की ख़ामोशी थी।
फिर ठंडी सी आवाज़ आई,,
*“सादिक” तुम बेवजह इतना क्यों सोचते हो। घर का काम मैं ओर “बस” अम्मी।”*
ये “बस” उसके दिल पर हथौड़े की तरह पड रहा था।
अब “सादिक” चिड़चिड़ा रहने लगा। उसकी आँखों की चमक धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी। “सादिया” की बेरूखी उसे अंदर ही अंदर तोड़ रही थी।
“एक रोज़ माँ पूछती,,
*“क्या हुआ बेटा?”*
वो बस मुस्कुरा कर कह देता,
*“कुछ नहीं अम्मी।”*
लेकिन “कुछ नहीं” के पीछे बहुत कुछ था।
*”शिकायत, मायूसी, और एक टूटा हुआ भरोसा।,,*
वो नाराज़ भी होता,ओर उदास भी।
नाराज़ इस बात से कि “सादिया” उसकी अहमियत नहीं समझ रही।
उदास इस बात से कि वो उसे समझाने की ताक़त भी खो रहा है।
एक दिन उसने मैसेज किया-
*“अगर मैं तुम्हारी ज़िंदगी में ज़रूरी नहीं हूँ, तो साफ़ कह दो।”*
जवाब घंटों बाद आया–
“ऐसा मत सोचो “सादिक”। तुम बहुत इमोशनल हो।”
उस एक जुमले ने उसे अंदर तक हिला दिया।
*”क्या मुहब्बत करना “इमोशनल” होना है?*
“क्या इंतज़ार करना कमज़ोरी है?
“सादिक” ने धीरे-धीरे खुद को समेटना शुरू किया।
कम कॉल करने लगा।
कम शिकायतें।
कम उम्मीदें।
मगर दिल… दिल तो अब भी उसी की आवाज़ को तरसता रहता था। अपने दिल को तसल्ली देने के लिए कभी-कभी वो पुरानी कॉल रिकॉर्डिंग सुन लेता।
“सादिया” की हँसी, उसका “अच्छा सुनो”, और खुद ही रो पड़ता।
वो जान गया था कि मुहब्बत सिर्फ़ साथ होने से नहीं टूटती कभी-कभी बेरूखी भी उसे मार देती है।
मंगनी बरक़रार थी।
तस्वीरें वही थीं।
अंगूठी वही थी।
मगर उन दोनों के दरमियाॅं गुफ़्तगू मर चुकी थी।
और “सादिक”…
वो ज़िंदा था, मगर अंदर से ख़ामोश, बिल्कुल टूटा हुआ।
उसने एक रात आख़िरी मैसेज लिखा–
*“अगर कभी तुम्हें मेरी कमी महसूस हो, तो समझ लेना कि मैंने तुम्हें बेइंतिहा चाहा था।”*
उस रात के बाद “सादिक” ने इंतज़ार करना छोड़ दिया।
मुहब्बत अब भी थी–मगर आवाज़ नहीं, मानों वीरान मुहब्बत।
कुछ रिश्ते टूट कर नहीं,
ख़ामोशी से दम तोड़ते हैं।
क्योंकि,,
कुछ लोग मर कर नहीं जाते
वो बस किसी की बेरूखी से थक कर हमेशा के लिए ख़ामोश हो जाते हैं।
लेखक- साजिद अली सतरंगी


