बज़्में अदब का मुशायरा, शायर गौहर जमाली का किया गया सम्मान
रायपुर, बज़्मे अदब ने शनिवार को राजधानी में रात शेरो-शायरी की महफिल सजाई गई। बयादगार अकबर कामरेड एवं सलमा सरोश ऑल इंडिया मुशायरे के इस आठवें आयोजन में देश के विभिन्न हिस्सों से नामचीन शायरों और शायरात ने उपस्थित होकर मुशायरे को यादगार बना दिया। लम्बे अर्से के बाद शहर में एक कामयाब मुशायरा हुआ । वृंदावन हॉल में हुए इस मुशायरे में आखिरी तक श्रोता जमे रहे, सभी हॉल श्रोताओं से खचाखच भरा रहा शायरों ने प्यार – मोहब्बत और दिलों को जोड़ने वाली ग़ज़ल नज़्म पढ़ीं।
मुशायरे की सदारत करते हुए वरिष्ठ शायर आलम खुर्शीद ने उस्तादाना कलाम पेश किया। उनकी शायरी सुनकर श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए:-
दुनिया हासिल करने वालों से पूछो इस चक्कर में क्या-क्या खोना होता है।
सुनता हूँ उनको भी नींद नहीं आती
जिनके घर में चांदी सोना होता है।
मुशायरे का संचालन करते हुए प्रोफेसर रहमान मुसव्विर ने एक से बढ़कर एक शेर सुनाये । उन्होंने अपने ग़ज़ल पेश करते हुए कहाः अजीब हाल है सो सो के दिन बिताता हूँ अंधेरी रात में सूरज से मिलने जाता हूँ।
बिछा के जिस्म को अपने चटाई की सूरत तेरे ख़्याल का कंबल उसे उढ़ाता हूँ।
रायबरेली से आई मशहूर शायरा तारा इकबाल ने ज़िंदगी के तजुर्बात को शायरी में ढाल कर सुनाया । श्रोताओं ने उनकी शायरी को खूब सराहा :-
देर से सही लेकिन सीख तो गए हम भी दर्द से गुज़रना भी और मुस्कुराना भी अब तो दौरे हाज़िर में मारका है इक ये भी लड़कियाँ बचाना भी लड़कियाँ पढ़ाना भी।
शायर तसनीफ हैदर ने ग़ज़लों के साथ साथ नज़्में भो सुनाई। पेश है चंद शेर :

अपने होने से जो मायूस है उस आदमी को अपने होने की कई बार खबर चाहिये है रुखी सूखी वे गुज़ारा नहीं करता मेरा दिल जो निवाला भी मुझे चाहिये तर चाहिये है।
नुरूससबाह खान सबा मुशायरे में शामिल प्रदेश की बेहतरीन नुमाइंदगी की। छत्तीसगढ़ दुर्ग की एक मात्र शायरा सबा ने प्यार मोहब्बत पर आधारित ग़ज़लों के अलावा ज़िंदगी की सच्चाईयों को बयान करती हुई शायरी सुनाई :-
मेरी तुरबत पे वो नहीं आया जिसकी फुरकत ने मुझको मारा है सारी दुनिया को जीतने वाला अपने बच्चों के आगे हारा है।
शायरा नीलोफर नूर ने ग़रीबी मजबूरी की तरफ इशारा करते हुए जब ये शेर पढ़ा तो हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठाः-
रस्सी पे चल रही थी नन्ही सी एक गुड़िया मजबूरियाँ थीं शायद दरपेश रोटियों की हर कोई चाहता है घर घर में चाँद उतरे चाहत नहीं किसी को आँगन में तितलियों की।
इश्क और जिंदगी की हकीकत को सभी शायरा राफ़िया जैनब ने बड़ी खूबसूरती से ग़ज़लों में पेश किया। उन्हें खूब वाहवाही मिली :-
शाख से हो के जुदा गुल पे तेरे क्या गुज़री बागबाँ को ये किसी रोज़ बताया जाए है ज़रूरत तो इसे सिर्फ ज़रूरत कहिये बे वजह इश्क को क्यों बीच में लाया जाए।
सांप्रदायिकता पे प्रहार करते हुए शायरा प्रियंवदा इल्हान ने बेहतरीन ग़ज़लें पेश की। उनके इन शेरों को खूब दाद मिली:-
जब भी हम करके यार तेरा ध्यान गज़ल कहते हैं। उस गज़ल को ही मेरी जान ग़ज़ल कहते हैं।
उसको लगता है कि भाषा का धरम होता है उसको लगता है मुसलमान गज़ल कहते हैं।
जात और मज़हब तो सबके दर्ज हैं काश दुख भी लिंक हो आधार से।
दिल्ली से आए शायर एक कुंवर रंजीत सिंह चौहान ने बहुत ही मेयारी शायरी पेश की। श्रोताओं ने उनके अंदाज़ को पसंद किया:
अब देखना है कौन बुझाता है ये चराग वो भी हवा के साथ है मैं भी हवा के साथ
मुसलसल याद में रोकर हमारी हमें दिल से निकाला जा रहा है तेरी तस्वीर तो मुमकिन नहीं थी तुझे लफ़्ज़ों में ढाला जा रहा है।
कहीं सूरज मिले तो रहना है कहाँ तेरा उजाला जा रहा है।

मुशायरे को आयोजक संस्था बज़्में अदब की ओर से रियाज़ अकबर और अन्य सदस्यों ने शायरों का स्वागत किया। आभार प्रदर्शन कैस जमाल ने किया। मुशायरे के प्रारंभ में बज़्मे अदब की जानिब से उर्दू खिदमात के लिए वरिष्ठ उस्ताद शायर गौहर जमाली का सम्मान किया गया।


